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भूमिका।
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इतिहासकी आवश्यक्ता।
जिस प्रकार किसी व्यक्तिविशेषकी मान-मर्यादाके लिये उसकः पूर्ववृत्तान्त जानना आवश्यक है, उसी प्रकार किसी देश व समाजको वर्तमान समारमें सन्मान प्राप्त करने के लिये अपना इतिहास उपस्थित करनेको आव. श्यक्ता है । एक विद्वानका कथन है कि भारतवर्षकी संसारमें आज जो कदर होना चाहिये वः इसी कारणसे नहीं होती कि संमारको इस देशके सच्चे और गौरवपूर्ण इतिहासका पता नहीं है । यह उक्ति जैन धर्मके विषयमें और भी विशेषरूपले घटित होती है । संसारकी विद्वत्समाजमें जो
आज जैनधर्मके विषयमें अनेक भ्रमपूर्ण कल्पनायें और मत फैले हुए हैं उनका मूल कारण यही है कि अभीतक जैन धर्मका सच्चा इतिहास संसारके सन्मुख नहीं रक्खा गया । जबतक यह कमी सुचारुरूपसे पूरी नहीं की जायगी तबतक न तो उन भ्रमपूर्ण कल्पनाओंका निराकरण हो सक्ता है और न जैनधर्मका गौरव संसारमें बढ़ सक्ता है । प्रमाणिक इतिहासके साधन । ____एक समय था जब मनुष्योंकी ऐतिहासिक लालसा किसी प्रकारकी भी दैवी व मानुषी घटनाओं के पढ़ने सुननेसे तृप्त हो जाती थी, पर आजकल इतिहासका अर्थ कुछ और ही होगया है । आजकल केवल वे ही घटनायें इतिहास क्षेत्रमें मान्य होसक्ती हैं जो प्राकृतिक नियम व मानवीय युक्तिके अविरुद्ध होती हुई निम्नलिखित आधारों द्वारा अपनी प्रमाणिकता सिद्ध करती हैं:
१-तात्कालिक शिलालेख, ताम्रपत्र, मुद्रा आदि । २-सामयिक ग्रन्य। ३-पुरातत्व सकधी वंसावशेष । ..
४-कुछ समय पीछेके शिमलादि व अन्यादि। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com