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________________ प्रस्तावना । . [२१ .. महाभारतके शांति पर्वके ३३७ वें अध्यायमें राजा वसुने एक अश्वमेध यज्ञ भिषजोंका किया था। यह वर्णन है। इससे प्रकट है कि पहिले पशु यज्ञमें नहीं होमे जाते थे। पशु यज्ञकी उत्पत्ति जिसप्रकार जैनपुराणमें राजा वसु द्वारा हुई बतलाई गई है वैसे ही उक्त पर्वके ३३९ वें अध्यायमें राजा वसुको ही उसका प्रतिपादक बतलाया है। यह अधिक परिवर्तन जैन पुराणोंके अनुसार निम्नप्रकार हुआ था। काल विशेष हुआ कि राजा वसुके राज्यमें नारद और उनके शिष्य परवतमें अज शब्दपर विवाद हुआ। अज शब्दका अर्थ (१) तीन वर्ष तक पुराने न उगने योग्य चांवलोंका है और (२) अज नाम बकरेका भी है। परवत, जिसे मांस भोजनका शौक था, अब . शब्दका बकरा अर्थ लगाता था और नारद वह उत्पाद शक्ति रहित धान बतलाता था। परवतकी पराजय सर्व जनताके समक्षमें सर्व सम्मत्यनुसार हुई । तब उसने राजासे प्रार्थना की। गजा परवतके पिताका शिष्य था। राजाको परवतके पक्षमें लानेको उसकी मां गजासे एकांतमें मिली और अपने पतिकी गुरुदक्षिणाके रूपमें एक वचन मांगा । वसु राजी हो गए और अपना वचन दे दिया । पावतकी माने परवतके अर्थकी पुष्टि करनेकी याचना की। तब वमुन बहुत पश्चात्ताप किया, परन्तु उसकी माता अपने विषयपर अटल थी। दूसरे दिन वह विषय राजाके सम्मुख उपस्थित किया गया जिसने रक्तके वचनकी पुष्टि की। इस कारण वसुका सर्व-नाश हुआ च परवत राज्यसे निकाल दिया गया, परन्तु वह अपने मतके प्रचार करनेमें प्रयत्नशील रहा । जब वह अपने मतके प्रचारके मार्गका विचार . कर रहा था तब उसे एक पटलवासी देव ब्राह्मणके रूपमें मिला और Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035242
Book TitleSankshipta Jain Itihas Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1943
Total Pages148
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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