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________________ १२८] संक्षिप्त जैन इतिहास प्रथम भाग। जो जिसको परास्त कर देता था वह अपने विजयी विपक्षीकी शरण आ जाता था। इस तरहसे दोनों ओरके लाखों योद्धाओंके प्राण बच जाते थे। ____ भगवान ऋषभदेवनं ग्राम, पुर आदि बसाकर उनमें बसनेवाले नागरिकोंको उन्होंने उनकी आवश्यकताके अनुसार भूमि बांट दी थी और प्रत्येक अपनी उसी भृमिसे कृषि आदि कर गुजारा करते थे। उसे वेचते नहीं थे; क्योंकि राजाकी ओरसे ही प्रत्येक नागरिकके लिये भूमिकी सीमा नियत थी। कृषकका बड़ा सम्मान था। उसे कोई सताता नहीं था और न उसकी खेती बरबाद की जाती थी, यद्यपि युद्ध उसके खेतके पास ही कदाचित् क्यों न होता हो? कृषि विषयक अन्वेषण भी राजा लोग कराते थे और कृषकोंको बताते थे । ग्रामके अन्य नागरिक व्यवसाय आदि किया करते थे और संभवतः जिस कुटुंबका वह सदस्य होता था, उसके द्वारा उसे उस व्यवसायके उपलक्षमें कृषिके उपार्जनमेंसे कुछ दिया जाता था । भगवानने जिस अपूर्व श्रुतको बताया था, वह अर्धमागधी भाषामें " सूत्ररूप" था । उस समयके व्याकरण, गद्य पथके शास्त्र विशिष्ट थे। बहुधा लोग अपनी उत्कृष्ट स्मरणशक्तिसे उन्हें कण्ठस्थ रखते थे और इस प्रकार उनको लिपिबद्ध करनेकी भी आवश्यकता नहीं पड़ती थी। लेखन कलाका व्यवहार वह लोग अपने जीवनके साधारण कृत्य, व्यापार आदिके लिए करते थे। उपर्युक्त वर्णनकी पुष्टि जैन शास्त्रों के वर्णनोंसे होती है, जिनका कथन भारतीय इतिहासके लिए एक आवश्यक सामग्री है । तिसपर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035242
Book TitleSankshipta Jain Itihas Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1943
Total Pages148
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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