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________________ भगवान महावीर का साम्यवाद संसार में जब कभी स्वार्थ, लोभ आदि का साम्राज्य बढ़ जाने के कारण मानव, मानव का रक्षक न रहकर भक्षक बन जाता है, उस समय सारे संसार में अशान्ति फैल जाती है, विषमता बढ़ जाती है। श्रीमन्ती और गरीबी इन दोनों के बीच भयंकर दावानल सुलग उठता है। यह अग्नि यहां तक फैल जाती है कि व्यक्तिगत बैर ही नहीं रहता, राष्ट्र-राष्ट्र के बीच में भी लड़ाइयां शुरू हो जाती हैं और निर्दोष मानव जाति का संहार हो जाता है। मानव जाति में हिंसक वत्ति उत्पन्न हो जाती है। उस हिंसक वत्ति के परिणाम से, कुदरत भी अपने मानव संहार के शस्त्रों का उपयोग करने लगती है । भूकम्प, अतिष्टि, अनावृष्टि, बाढ़, कीड़ों का उपद्रव, नाना प्रकार के रोग, दुष्काल अग्नि प्रकाण्ड, इत्यादि अनेक प्रकार के उपद्रव खड़े हो जाते हैं। मानव खास करके पढ़े लिखे समझदार लोग उसको 'देवी प्रकोप' अथवा कुदरत का प्रकोप कहते हैं, और है भी। किन्तु यह प्रकोप हमारी हिंसक वृत्ति का, हमारे पापों का परिणाम है, इस बात को वे भूल जाते हैं । इन उपद्रवों से बचने का एक ही उपाय है और वह है हिंसक वृत्ति को दूर करना। हमारी सुख समृद्धि के लिए हम हिंसक वृत्ति द्वारा जितने भी उपाय कार्यावित करते हैं, वे निष्फल होंगे और हो रहे हैं। इसका प्रत्यक्ष अनुभव वर्तमान समय में छोटे-बड़े सभी कर रहे हैं। जगत की शान्ति का एकमात्र उपाय है समस्त जनता के मनोभावों में समान भाव का उत्पन्न होना। जब तक हम एक Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035233
Book TitleSamayik Lekh Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherVijaydharmsuri Jain Granthmala
Publication Year1953
Total Pages130
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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