SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 29
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ [भाग-1] श्री आगमीय-सूक्तावलि-आदि आगमीय सूक्तावलि [उत्तराध्ययनसूक्तानि] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण पुन: संकलित: आगमीय-सूक्तावलि-आदि (आगम-संबंधी-साहित्य) श्री आगमीयसूक्तावली उत्तराध्यय नस्य सूक्तानि ॥१७॥ ६६ दुक्खं हयं जस्स न होइ मोहो, मोहो हो जस्सन | इस्वीजणस्सारियाणजुग्गं, हियं सया बंभवए रयाणं ॥ होइ तण्हा । तण्हा हया जस्स न होहलोभो, लोमो |७३ कामं तु देवीहिं विभूसियाहिं, न चाश्या खोभाउ तिगुत्ता। हओ जस्सन किंचणाई ॥ (६२३) तहावि एगंतहियंति नचा, विवित्तवासो मुणिणं पसत्थो॥ ६७ रसा पगामं न हु सेबियच्या, पायं रसा दिसिकरा |७४ मुक्खाभिकंखिस्सवि माणवस्स, संसारभीरुस्स ठियस्स नराणं । दित्तं च कामा समभिवंति, दुमं जहा धम्मे । गेयारिस्सं दुत्तरमस्थि लोए, जहत्यिो बालसाउफलं व पक्खी ॥ | मणोहराओ॥ ६८ जहा दबग्गी पडरिंधमे बणे, समारुओ नोवसम | ७५ एए य संगा समइक्कमित्ता, सुहुत्तरा व हवंति सेसा । उवेह । एबिंदियग्गीवि पगामभोइणो, न बंभयारिस्स जहा महासागरमुत्तरित्ता, नई भवे अवि गंगासमाणा ॥ हियाय कस्सइ॥ ७६ कामाणुगिद्धिप्पभवं खु दुक्खं, सब्यस्स लोगस्स सदेव१९ विवित्तसिग्जाऽऽसणजंतियाणं, ओमासणाणं दमिदंदिया । ___ गस्स । जे काइयं माणसियं च किच्चि, तस्संतयं नरागसत्तू धरिसेद चित्तं, पराइयो बाहिरियोसहेहि ॥ - गच्छद बीयरागो॥ ७० जहा विरालायसहस्स मूले, न मूसगाणं पसहीपस- ७७ जहा य किंपागफला मणोरमा, रसेण बनेण व भुजमाणा। स्था । एमेव दस्थीनिलयस्स मज्झे, न बंभयारिस्स ते खुदए जीषिय पचमाणा, एओषमा कामगुणा विधागे (१२५) खमो निवासो ॥ ७८ न कामभोगा समयं उविति, न यावि भोगा विगई उचिंति । ७१ न रूबलावण्णबिलासहासं, न जंपिअंइंगिय पहियं वा।। जे तप्पभोसी य परिग्गही य, सो तेसु मोहा विगई उबेद ॥(६३५) इत्थीण चित्तंसि निबेसइत्ता, दट्ट, वयस्से समणे तवस्सी। |७९ अच्चणं रयणं चेच, बंदणं पूभणं तहा । ७२ असणं चेव अपत्थणं च, अचिंतणं चेव अकित्तणं च ।। बहीसकारसम्माण, मणसावि न पत्थए । ॥१७॥ "आगम-संबंधी-साहित्य" श्रेणी [भाग-1] ~29~
SR No.035071
Book TitleAagam Sambandhi Saahitya 01 Aagamiy Sooktaavalyaadi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages96
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_related_other_literature
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy