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________________ आगम (४०) प्रत सूत्रांक [H] दीप अनुक्रम H [भाग-5] “आवश्यक”- मूलसूत्र - १ (निर्युक्तिः + वृत्तिः) ३ अध्ययनं [-], निर्युक्ति: [ ७६३-७६४ ], वि० भा० गाथा [-], भाष्यं [ १३७...], मूलं [- / गाथा-] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनिर्युक्तिः एवं मलयगिरिसूरिरचिता वृत्तिः श्रीआव श्यक मल इयं कालं संगोवितो, एत्ताहे तुमं संगोवेहि, ततो तेण भणियं मा ते पच्छातावो भविस्सइ, ताहे सक्खीकाऊण गहितो छम्मासितो, ताहे तेण चोलपट्टेण पत्ताबंधिओ, न रोवइ, जाणइ सन्नी, ताहे तेसु उवस्सयं आगए आयरिएहिं भाणं य० वृत्ती भारियंति हत्थो पसारितो, दिन्नों, हत्थो भूमिं पत्तो, भणंति- अजो ! नज्जइ वरंति, जाव मुकं, पेच्छंति देवकुमारोवमं उपोद्घातेदारगं, भणति य-सारक्खह दारगं एयं पवयणस्स आहारो एसोत्ति, तत्थ से वइरो चैव नामं कथं, ताहे संजईण दिन्नो, ★ ताहिं सेज्जायरकुले, सेज्जायरगाणि जाहे अप्पणगाणं चेडरुवाणं पीहगं वा पहाणं वा मंडणगं वा करेंति ताहे सबं तस्स करेंति, ॥ १८७॥ जाहे उच्चाराई आयरइ ताहे आगारं दंसेइ कूबेइ वा, एवं संवहुइ, फास्यपडोयारो तेसिं इट्ठो, साहूवि वाहिं विहरंति, ताहे सा सुनंदा पमग्गिया, तातो निक्खेवगोत्ति न देंति, सा आगया थणं देइ, एवं तिवरिसो जातो । अष्णया साहू विहरंता आगया, तत्थ राउले वबहारो जातो, सो धणगिरी भणइ- मम एयाइ दिन्नं, तो नगरं सुनंदाए- पक्खियं, ताए बहूणि खेलगाणि गहियाणि, रन्नो पासे ववहारे च्छेदो, तत्थ बहुत्तो राया दाहिणतो संघो सयणपरियणो वामपासे नरवइस्स, तत्थ राया भणइ-मम के अध्पगा ? के परे १, जतो चेडो जाइ तस्स भवतु, तेहिं पडिस्सुयं को पढमं वाहर १, पुरिसोत्तमो धम्मोति पुरिसो बाहरउ, ताहे नगरजणो आह-एएसिं परिचिओ, माया सदावडे, अविय-माया दुक्करकारिया, पुणो य पेलवसत्ता, तम्हा एसा चैव बाहरउ, ताहे आसहत्थिरहउसमेहिं मणिकणगरयणचित्चेहि बालभावलोभावगेहिं भणइ एहि वयरसामी !, ताहे पलोएंतो अच्छइ, चिंतेइ य-जइ संघं अवमन्नामि तो दीहसंसारिओ भवि सामि, अविय - सावि पञ्चइस्सति, एवं तिष्णि वारे सद्दावितो ण एइ, ताहे से पिया भणइ - जइ सि कयववसातो For Pevato & Personal Use Only ~197~ श्रीवज्रवृत्त ॥३८७॥
SR No.035065
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 2 05 Aavashyak Niryukti evam Vrutti Aagam 40 Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages327
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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