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________________ आगम (४०) [भाग-5] "आवश्यक'- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+वृत्ति:) ३ अध्ययनं -], नियुक्ति: [७६५], विभा गाथा [-], भाज्यं [१३७...], मूलं [-/गाथा-] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र [४०], मूलसूत्र [१] आवश्यकनियुक्ति: एवं मलयगिरिसूरिरचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक धम्मज्झयभूसियं इमं वइर! गेण्ह लहुं रयहरणं कम्मरयपमजणं धीर ॥१॥ताहे तेण तुरियं गंतूण गहियं, लोगेण 'जयइ धम्मो'त्ति उक्किटिसीहनादो कतो, ताहे सा माया चिंतेइ-मम पई भाया पुत्तो य पबइतो, अहंपि किं अच्छामि?, एवं सावि पवइया। ४जो गुज्झगेहिं पालो निमंतिओ भोयणेण वासंते । नेच्छह विणीयविणओ तं बहररिसिं नमसामि ॥७६५ ॥15 । यो बालः सन् गुह्यकैर्देवैर्वपति सति, पर्जन्य इति गम्यते, भोजनेन निमन्त्रितो, नेच्छति विनीतविनयो, वर्तमाननिर्देशस्त्रिकालविषयं सूत्रमिति प्रदर्शनार्थः, पाठान्तरं वा 'नेच्छंसु विणयजुचो' इति, 'तं वइररिसिं नमसामि' तं वन-* ऋषि नमस्यामि, एष गाथासमुदायार्थः, अवयवार्यः कथानकादवसेयः, तच्चेदम्-सो जाहे थणं न पियइ ताहे पवावितो, साहुणीण चेव पासे अच्छइ, तेण तासिं पासे एक्कारस अंगाणि कण्णाहेडेण गहियाणि, पयाणुसारी सो भयवं, ताहे अट्ठवरिसओ संजइपडिस्सयाओ निक्कालिओ, आयरियसगासे अच्छइ, आयरिया य उजेणिं गया, तत्थ अहोधार वासं पडइ, तया से पुत्रसंगइया जंभगा तेणंतेणं वोलेंता तं पेच्छंति, ताहे परिक्खानिमित्तमोइण्णा, वाणियगरूवेण बलद्देत्ता उबक्खड़ति, सिद्धे निमंतंति, ताहे पट्टितो जाव कणगफुसियमस्थि ताहे पडिनियत्तइ, ताहे संठाइ, पुणो सद्दावेंति, ततो वइरो गंतूण भिक्खाए निणियाए उवउत्तो-दबतो पूसफलाइ खेत्ततो उजेणी कालओ पाउसो भावतो धरणिछिवण18नयणनिमेसाइरहिया पड्डा तुट्ठा य, ताहे देवत्ति काऊण नेच्छद, देवा तुट्टा भणति-तुम छुमागया, पच्छा बेउ-15 वियविजदेति, दीप अनुक्रम 4-* 2- JanEtacncionematiana ~198~
SR No.035065
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 2 05 Aavashyak Niryukti evam Vrutti Aagam 40 Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages327
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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