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________________ आगम (४०) । भाग-5 “आवश्यक"- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+चूर्णि:) 3 अध्ययनं [६], मूलं [सूत्र /६३-९२] / [गाथा-], नियुक्ति : [१६५२-१७१९/१५५५-१६२३], भाष्यं [२३८-२५३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता: आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनियुक्ति: एवं जिनभद्रगणिरचिताचूर्णि: 3 प्रत सूत्रांक [सू.] प्रत्याख्यानचूर्णिः विधि: ॥३२३॥ दीप अनुक्रम [६३-९२] है वहति, विणतोवहिता दुबिहा- वक्खित्ता य अवक्खिता य, वक्खित्ता जा सुणेति सिव्यति वा एवमादिया, अवक्खित्ता ण कंचिविल अर्म करेति केवल सुणेति, अवक्खिताए कहेयर, जा सा अबक्खित्ता सा दुविहा-उबउत्चा अणुवउत्ता य, अणुबउत्ता जा सुणेति अण्णण्णाणि प चिन्तेति, उवउत्ता जा निचिन्ता सुणति, उपउत्ताए कहेयध्वं, पच्चक्खाणं एरिसियाए परिसाए कईयवं, ण केवल पच्चक्खार्ण, सम्वं आवासयं सब्बं सुयणाणं कद्देयव्य, कार विहीए कहेयब्बी, पुष्वं भाणिय-मुत्तत्थो खलु पदमो॥२४॥ तत्थ विसेसो जो आणाए गझो अत्थो भवति सो आणाए कहेतव्यो,जदि आणाए दिहतो भवति तो दिहतेण कहेयब्बो भवति, अण्णाहा। कहणविधि विणासिया भवति, एत्थ बाणियदारतो उदाहरणं, वाणिएण पुत्तो रयणपरिच्छितं सिक्वाचितो,तस्स य बहुया रपणा, | भरंतो भणति-एते रयणा, हमस्स माणिकस्स एत्तियं मुलं, एयस्स य इमंति, तं स सरहति, पवि तातो अलिक्कयं भणिहिति । एवं | | उवणतो वीयरागा हि सर्वज्ञा०सिलोगो,यो दृष्टान्तसाध्योऽर्थो तत्थ दिहतो भाणितब्बो, तत्थ मातंगो उदाहरणं,एगेण हरितेण ४ भोतिए सागारियठाणं पासिऊण भमति-अहो ते सुंदरं, तीए भणियं-जदि मम खन्तीए पासज्जास तो ते विम्हतो होन्तो, आवत्तो तो गामं गतो जत्थ से खंती, तेणं सा णिवातिया, सा कप्पही?, भणति-अकल्ला, तो जामो, एवं होउति पटियाणी, तेण य ततो पत्तएणं अमत्थ मंस अमत्थ सुरा एवमादीणि वह्निताणि, एतो ण भवति, एस सउणो वाहरति, भणति-मंस लेहि, महा गया, पालद्धं, एवं पुणो पसियावीया, ताहे ताए णायं महानेमिची एस. ताहे पुणोवि सउणेण बाहरितं, ताहे कण्णा ठएति, पुच्छति-कि ठएसि', भणति-सङणो बाहरति जंतं असोतब, णिबंध करेति, भणति- अक्खामि, सउणो भणति-जदि ते पडिसेवामि तो तीए कप्पड्डीए अस्थि जीवितं, अहणवि तो मरति, पडिस्मुयं पडिसविया, एवं उवणयविभासा ॥ याणि फलं, तं दुविहं-इहलोए ॥३२३॥ (336)
SR No.035055
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 06 Aavashyak 3 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages343
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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