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________________ आगम (४०) । भाग-5 “आवश्यक"- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+चूर्णि:) 3 अध्ययनं [६], मूलं [सूत्र /६३-९२] / [गाथा-], नियुक्ति : [१६५२-१७१९/१५५५-१६२३], भाष्यं [२३८-२५३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता: आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनियुक्ति: एवं जिनभद्रगणिरचिताचूर्णि: 3 सप्तम काभोगमान. प्रत सूत्रांक [सू.] दीप अनुक्रम [६३-९२] प्रत्या- ताहे तुच्छाओ ओसहीतो परिहरति, जहा मुग्गसिंगातो चणगादिसिंगातो इच्चादि,तत्थ दोसे सिंगरखातो उदाहरणं, खेचरक्ख-12 तो मुग्गसिंगाओ खाति, राया णिग्गतो, खायंत पेच्छति, ततो पडिनियत्तो तहवि खायति, वलयाणं कूड़े कयं, रमा पोई फलाचूर्णिः वियं कत्तियातो खत्तियातो होज्जा,णवरि फेणो,किंचिविणत्थि,अहवा केसिंचि केति अतियारा जहासमवं जोज्जा, अभिग्गहबिससेण॥२९६॥18|वा होज्जा । इमं च अच-भोयणतो असणे अणंतकायं अल्लगादि मंसादि,पाणमि रसगवसमज्जादि,खादिमे उदुम्बरवडापिप्परिपिलक्सु- मादीसु महुमादिसु सादिमे सतितो वयं,जो पुण अभिग्गहविसेसेणं उवभोगपरिभोगविहिपरिमाणं करेति सो उम्बलणियाबणविहि-र परिमाणं करति,एवं दंतवणविहे य फलविहे य अभंगणतेल्लविहे य,उबलणबिहे य एसि मज्जणजलवत्थवि० विलेवणविही आभरण-11 विहे पुप्फविहे धूवविहे,मोयणविहिपरिमाणं करेमाणो भिज्जाविहि परिहीखज्जगविही सूयविही चोप्पडविही माहुरगविही परिजेमणग-४ सूत्र | विही पाणियविही सागविही एवमादिविहि महुमांसविहीपरिमाणं करंति, अवसेसे पच्चक्खामित्ति । कम्मे अकम्मो ण तरवि राजीविउं ताहे सावज्जाणि परिहरउ बहुसावज्जाणिवा, तत्थ पन्नरस कम्मा ण समातरियव्या, इंगाले दाहिऊण विक्किणति, तत्पर | छक्कायाण वधो, तत्र वदृति, अहवा लोहकारादि १ वणकम्मं जो वर्ण किणति, पच्छा रुक्खे छिदिऊण जीवति तेण मुल्लेणं, एवं पं(ख)डिगादीवि पडिसिद्धा भवंति २ सागडिगनेणं जीवति तत्थ एवं वहादी दोसा ३ भाडगकम एस णं भंडीवक्खरेण भाडएणं बहति पराय, अमाण वा भाडएणं सगडबलरवमादि ४ फोडितो उक्खणणं, हलेणवि भूमी फोडिज्जति ५ दंतवाणिज्जे पुलि-II दाणं मोल्लं देति पुज्यं चेव दन्ते देहित्ति,पच्छा ते मारेंति अचिरत्ति सो वाणियतो एहितित्ति, एवं मग्गे रणे संखाणं जीवति,एवं चमरादीण,ण बद्दति,पुयाणीत किणंतिविलक्खावाणिज्जेवि एस चेव गमगो,तत्थ किर किमिगा हाँति,किमिया किं(ण)रुधिरस्म वा २९५ (309)
SR No.035055
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 06 Aavashyak 3 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages343
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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