SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 294
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम (४०) प्रत सूत्रांक [सू.] दीप अनुक्रम [६३-९२] भाग-5 “आवश्यक”- मूलसूत्र - १ (निर्युक्तिः+चूर्णि:) 3 अध्ययनं [६], मूलं [सूत्र / ६३-९२ ] / [गाथा-], निर्युक्ति: [ १६५२-१७१९/१५५५-१६२३], भाष्यं [२३८-२५३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिताः आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [०१] आवश्यकनिर्युक्तिः एवं जिनभद्रगणिरचिताचूर्णि: 3 प्रत्याख्यानचूर्णिः ॥२८१ ॥ दारिया दिट्ठा, चोरिति गहिता परिणीता य । अष्णदा वाहिंगइयाहि रमति, रायणियाए पोतं बाहेति, इतरी पोतं दिती य विलग्गा, रण्णा सारियं, मुका पव्वतिया । एवंविहं दुर्गुछाफलं ॥ परपासंडपसंसाए - पाडलिपुत्ते चाणको, चंदओतेण भिच्छुयाणं वित्ती हरिता, ते तस्स धम्मं कहेंति, राया तूसटि, चाणकं पलोति, ण पसंसतित्ति ण देति. तेहिं चाणकभज्जा ओलग्गति, तीए सो करणं कारितो तेहि कहिते भणति - सुभासितंति, रण्णा तं च अण्णं च दिष्णं, वितियदिवेस चाणको रायाणं भणति कीस दिष्णं १, भणति -तुम्भीह पसंसिंत, सो भणति मए पसितं अहो सव्वारंभपवना किह लोगवतियावणगाणि करेंतिति, पच्छा ठितो, कतो एरिसगा, तम्हा ण कातव्वा ।। संभवे सो चेव सोरहओ सङ्को एवं पंचातियारविसुद्ध संमतं मूलं गुणसताणं, मज्जादातिकमं पुण पकरेंतो अतिसंकिलिङ* परिणामेण सव्वत्थ परिचयति धम्ममिति। दारं मूलं परिद्वाणं, आहारो भाषणं णिही । तुछस्सस्स धम्मस्स, सम्मत्तं ४ परिकित्तियं ॥ ॥ एवमिदाणिं सुद्धे संमते बतावि गेण्तन्त्रा, तत्थ विसयसुहपिवासाए अहवा बंधवजणाणुराएण अचयंतो बावीस परिसहे दुस्सहे सहिउं जदि न करेति विशुद्धं सम्म अतिदुकरं तवच्चरणं तो कुज्जा गिहिधम्मं, ण य वंशो होति धम्मस्स । सत्र तस्थ पढमं धूलगपाणातिवातं समणोपासओ पच्चक्खाति (सू० ) इत्यादि, धूलगपाणा वेदियादी, तेसिं मज्जा ভল यातिक्कमेण पातो धूलगपाणातिवातो, से य पाणतिवावे दुबिहे-संकप्पओ य आरंभओ य, संकप्पओ पच्चक्खाति, णो आरंभतो अभिसंचिन्त पिवराही ण मारेतीत्यर्थः सचराहिंप जहसतिसारंभ तोत्तिकाएं सारंमे वावती नियमा तेण ण पंच्चक्खा (294) सम्यक्त्वा तिचाराः ॥२८१ ॥
SR No.035055
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 06 Aavashyak 3 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages343
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy