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________________ आगम (४०) । भाग-5 “आवश्यक'- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+चूर्णि:) 3 अध्ययनं [५], मूलं [सूत्र /३७-६२] / [गाथा-], नियुक्ति : [१२४३-१६५१/१४१९-१५५४], भाष्यं [२२८-२३७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता: आगमसूत्र [४०]मूलसूत्र [१] आवश्यकनियुक्ति: एवं जिनभद्रगणिरचिताचूर्णि: 3 प्रत सूत्रांक ध्ययन ॥२६९॥ कायोत्सगा। उढे लंबावेइ काउस्सग्गे ठिओ, वारणो हत्थी, अण्णे भणंति-वाणरो मक्कडो, सो तहा उढे चालेत्ता अणुप्पेहेति १८ अहबा वारुणी जी सुरा जहा बुडबुडेति अणुप्पेहितो १९ एवमादी दोसे परिहोजा। णाभी करतल कोपर उस्मगे पारियमि धुती॥णाभित्ति |णाभीओ हेट्ठा चोलपट्टो कातब्बो, करतलत्ति हेढा लंबंतकरतलहिं ठतितब्बो कोप्परेहि धारेतब्बो, उस्सग्गे पारिते णमोद्वादीन्यअरहताणन्ति धुती कातव्वचि। दाहरणानि कीसत्ति कस्स पुण काउस्सग्गो विराधितो न भवति , वासीचंदणकप्पो जो मरणे जीविए य समदरसी । देहे | Mअप्पडिबद्धो काउस्सग्गो हवति सुद्धो ।।।। तत्थ पुण इमाओ आलंबणगाथाओ-पास्थि भयं मरणसमं जम्मेण समं नर विज्जती दुक्खं । जमणमरणायाहं छिंद ममतिं सरीरंमि ॥ १॥ अण्णं इमं सरीरं अपणो जीवोत्ति एवकतबुद्धी। दुक्खपरिकेसरि छिंद ममतिं सरीरातो ॥ १६४९ ॥ जावइया किर तुक्खा संसारे जे मए समणुभूता । एत्तो। दुव्विसहतरा णरएम अणोचमा दुस्वा ॥ १६५० ।। तम्हा तुणिम्ममेण मुणिणा उवलद्धदेहसारेणं। काउस्सग्गो कम्मक्खयहाए उ कातव्यो ।।१६५५।। इदाणिं फलं, एवंगुणसंपणं काउस्सग्गं करेमाणस्स एहियं फलं पारतिय च, एहिते | उदाहरणं सुभद्दा, कह?, चपाए जिणदत्तस्स धूता, सा सुभद्दारूविणी तच्चनियगसड्डेण दिट्ठा, अज्झविषण्णो मग्गति, अभिग्गहित-18 WIमिच्छादिद्विति ण लभति, साहसावं गतो, धम्म पुच्छति, कहिते कवडसावगधम्मं पगहितो, उवगतो से सम्भावो, आलोएति- ॥२६॥ मए दारियानिमित्तं कवडं आरद्ध, अण्णाणि अणुब्धताणि देह, दिण्णाणि, लोगप्पगासो साबगो जातो, कालंतरेणं वरगा पट्टविता, सम्मदिवित्ति दिण्णा, कतविवाहा विसज्जिता, जुतकं से घरं कतं, तच्चणिएसु भत्ती ण करेतित्ति सामुणणंदाओ पदुहाओ, भत्ता-18 ---EASTER ||गाथा|| दीप अनुक्रम [३७-६२] (282)
SR No.035055
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 06 Aavashyak 3 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages343
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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