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________________ आगम भाग-5 “आवश्यक'- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+चूर्णि:) 3 (४०) | अध्ययनं [५], मूलं [सूत्र /३७-६२] / [गाथा-], नियुक्ति : [१२४३-१६५१/१४१९-१५५४], भाष्यं [२२८-२३७] - पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता: आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनियुक्ति: एवं जिनभद्रगणिरचिताचूर्णि: 3 प्रत सूत्रांक ॥२६६॥ ||गाथा|| कायोत्सर्गा आलोएतब्ब, ताहे पडिकमिज्जति, चाउम्मासिए एगो उपसम्गदेवताए काउस्मग्गो कीरति, अब्भाहओ पभाते आवासए कते | ध्ययन चातुम्मासियसवत्सरिएसु पंचकल्लाणगं गेहंति, पुण्यगहिता अभिग्गहा णिवेदतब्बा, जदि ण सम अणुपालिता तो कूजितककराइतस्स काउस्सम्गो कीरति, पुणरवि अण्णे गेण्हितण्या, णिरभिग्गहेणं किर ण बट्टति अच्छितु, संवच्छरिए य आवासए कते पज्जोसवणाकप्पो कडिजति, पुचि चेव अणागतं पंचरतं सम्बसाधणं मुणिताणं कडिज्जति कहिज्जति यति। एते ताव बेलाणियमेण भणिता काउस्सग्गा, इमे अणियता, तत्थ दारगाथा--भत्ते पाणे० ॥२३४॥ गमणं गामादिसु आगमणं ततो चेक, भत्तस्स जत्थ वच्चति जदि ण ताव देसकालो ताहे पडिकभित्ता अच्छति, ततो पडियागतो पुणोवि पडिक्कमति, एवं पाणस्सवि, सयर्ण संधारओ वसही वा, आसणगं पीढमादि, एतेसि मग्गतो गतो एतं पडिक्खेज्ज, अरहतपरं गतो साधुणं च वसहिं गतो, अदुमिचउद्दसीसु४ि | अरहंता साधुणो य देतधा, उच्चारविओसग्गे पासवणवियोसग्गे दोसुवि जदिवि हत्थमे गंतूर्ण वोसिरति तोवि पडिकमति, अह मत्तए ताहे जो विगिचति सो पडिक्कमति, सेसएसु जदि हत्थसतं नियत्तणस्स बाहिं वा तो पडिकमति, अह अंतो फूण पडिकमति, एतेसु पणुवीस उस्सासा, गमणागमणचि गतं । विहारेत्ति असज्झाए अण्णस्थ सझायणिमित्तं गतस्स पणुवीस | उस्सासा ॥ इदाणिं सुत्तत्ति, उद्देससमुद्देसे सत्तावीसं अणुण्णवणियाए, सुते उद्दिढे जो काउस्सग्गो समुद्दिढे अणुण्णवणियाए, तेस &ा Xi॥२६६॥ कसचार्वास उस्सासा अच्छितूर्ण सयं चेव उस्सारति जदि असढो, सढस्स आयरिश्रा उस्सारैति, जाच आयरिओ न उस्सारेति ताव सुच टासायति, आयंबिलविसज्जणे विगयविसज्जणे य सत्तावीसं. उक्स्सयदेवयाए य सत्तावीस, कालग्गहणे पवणे य अणसणाए पडि-। कमणे अट्ट उस्सासा, आदिग्महणा कज्जणिमित्रं गच्छंतो अवक्खलितो अदु उस्सासे काउस्सग्गो कातब्बो, ताहे मंमति, जदि ARRIE%% दीप अनुक्रम [३७-६२] SE (279)
SR No.035055
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 06 Aavashyak 3 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages343
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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