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________________ आगम (४०) भाग-5 "आवश्यक- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+चूर्णि:) 3 अध्ययनं [४], मूलं [सूत्र /११-३६] / [गाथा-१,२], नियुक्ति : [१२४३-१४१५/१२३१-१४१८], भाष्यं [२०५-२२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता: आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनियुक्ति: एवं जिनभद्रगणिरचिताचूर्णि: 3 प्रत सूत्रांक + गाथा: ||१२|| अतिक्रमणाटा सेसे मजिसम, अस्य व्याख्या- कणगा० ॥१४८६ ॥ कणगा गिम्हे तिणि सिसिरे पंच पासासु सत्त उवहणति, उक्का एक्का कालमा ध्ययन शव उवहणति काल, कणगो सण्हरेहो पगासविरहितोय, उक्का महन्तरेहा पगासकारिणीय, अहवा रेहविरहितोवि फुलिंगो पहासकरो उक्का चेव । 'वासासु प तिषिण दिसा' अस्य व्याख्या-वासासु य०॥ १४८७ ।। जरथ ठितो वासकाले तिण्णिवि 1.२३५॥ दिसा पेक्वति तत्थ ठितो पाभातिर्य कालं गेण्हति, सेसेसु तिसुवि कालेसु बासासु उडुबद्धे चउसु चेव जत्थ ठितो चतुरोवि दिसाविभागे पेक्खति तत्थ ठितो गेण्हति ।। 'उहुपद्धेसाग्गा तिन्निति अस्य व्याख्या-तिसु निषिणः ॥ १४८८ ।। तिसुक कालेसु पादोसिए अङ्करत्तिए रत्तिए य जहण्णणं जदि तिगि तारिगाओ पेक्वंति तो गेहंति, उबद्ध वादा अम्भादिसंथडे जदिवि एक्कपि तारण देकखंति नहाबि पाभातियकालं गेहंति, वासाकाले पूर्ण चतुरोवि काला अब्म-1# संधडे तारासु अदीसंतीसुषि गण्हंति । छपणे णिविहात्ति अस्य व्याख्या- ठागासति ॥ १४८९ ॥ जदि वसहीए बाहि कालमाहिस्स ठामो णस्थि ताहे अंतो छष्णे उद्भडितो गण्हति, अह उद्धट्टितस्सवि अंतो ठातो णस्थि ताहेर छष्ण व निविट्ठा गेण्हति, बाहिं ठितो य एको पडियरति, वासबिन्दसु पडतीसु नियमा अंततो ठितो गेण्हति, तत्थषि उद्धहितो MY निसण्णो पा, नवरं पडियरगोचि अंतो ठितो चेच पडियरति, एस पाभातिए गच्छवग्गहडा अयवायविहीं, सेसा काला ठागासती। ण घेतब्वा, आइण्णओ बा जाणितव्वं । कस्स कालस्स कं दिस अभिमुहेहिं पुव्वं ठायवमिति भण्पाति-पादोसिय०॥ १४९०॥ ॥२३५।। पादासिए अद्धरतिए नियमा उत्तराभिमुद्दो ठाति, वेरथिए भयणति इच्छा उत्तरमुहो पुवमुहाँ वा, पाभातिए णियमा पुष्पमुहो।। इदाणि कालग्गहणपरिमाण भण्णति-कालचतु०॥१४९१ ।। उस्सग्गे उकोसेण चतुरो काला घेप्पंति, उस्सग्गे चेव जहष्णेण SRIRALAGEGRECOR दीप अनुक्रम [११-३६] (248)
SR No.035055
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 06 Aavashyak 3 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages343
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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