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________________ आगम (४०) भाग-5 "आवश्यक- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+चूर्णि:) 3 अध्ययनं [४], मूलं [सूत्र /११-३६] / [गाथा-१,२], नियुक्ति : [१२४३-१४१५/१२३१-१४१८], भाष्यं [२०५-२२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता: आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनियुक्ति: एवं जिनभद्रगणिरचिताचूर्णि: 3 प्रत सूत्रांक CRECESS + गाथा: ||१२|| SANSAR प्रतिक्रमणा 3 गुरू सामाश्यं करेता बोसिरामित्ति भणिचा ठिता उस्सग्गं ताहे पुवद्विता देवसियातियार चितेंति, अण्णे भणति- ताहे गुरू आवश्यकध्ययने सामाइयं करेंति ताहे पुवट्टियावि तं सामाइयं करेंनि, सेसं कंठं। जो होज्जः ॥ १४६४ ॥ परिसंतो प्राघूर्णकादि, सोपि सज्झा-दा विधिः ॥२३॥ मायझाणपरो अच्छति, जाहे गुरू ठंति ताहे तेऽवि बालादिया ठंति । एतेण विधिणा- आवासं० ॥१४६५।। जिणेहिं गणधराणं उच कालग्रहण ४|दिह, ततो परंपरएण जाव अम्हं गुरुवदेसेण आगतं ते कातुं आवस्सग अण्णे तिणि धुतीओ करेंति, अहवा एगा एगसिलोइया है बितिया बिसिलोइया तइया तिसिलोइया, तेसिं समत्तीए कालवेलपडिलहणविधी इमा कातव्वा, अच्छतु ताव विही, इमो काल-| | भेदो ताव बुच्चति दुविधो० ॥ १४६९ ।। पुब्बद्धं कंट, जा अतिरित्तवसही बहुकप्पटिगसेविया य सा घंघसाला, ताए णितअतिताणं घट्टण-18 पडणादि वाघातदोसो सडकहणेण य वेलातिक्कमदोसो एवमादि । बाघाते०॥ १४७० ।। तम्मि वाघातिमे दोणि जे कालप-10 डियरगा ते णिग्गच्छति, तेसिं ततिओ उवझायादि दिज्जति, ते कालग्गाहिणो आपुच्छणं संदिसावणं कालपवेदणं च सव्वं तस्सेव टू करेंति, एत्थ गडगदितो न संभवति, इतरे उवउत्ता चिट्ठति, सुद्धे काले तस्सव उवझायस्स प्रवेदिति, ताहे डंडधरगो चाहिं | "कालपडियरगो चिट्ठति, इतरे दुयगादिवि अंतो. परिसंति, ताहे उवज्झायस्स समीये सच्चे जुगवं पवेति, पच्छा एमो गीति, दंडधरो अतीति, तेण पट्ठविते मज्झाय करेति, 'निब्वाधाते' पच्छदं, अस्यार्थ:- आपुच्छण०॥ १४६८ ॥ निब्वाधाते दोण्णि जणा गुरुं पुच्छति-कालं घेच्छामो?, गुरुणा अब्मणुण्णाता कितिकमंति बंदणं कातुं डंडगं घेत्तुं उबउचा आवस्सितमासज्जं करेंता ॥२३॥ पमजंता य गच्छति, अंतो जदि पक्खुडति पति वा वस्थादि वा बिलग्गति कितिकम्मादि किंचि विवई करेंति तो कालवाघातो, दीप अनुक्रम [११-३६] ACRECACADEGA REWASHRESERRE (243)
SR No.035055
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 06 Aavashyak 3 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages343
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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