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________________ आगम (४०) भाग-5 "आवश्यक- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+चूर्णि:) 3 अध्ययनं [४], मूलं [सूत्र /११-३६] / [गाथा-१,२], नियुक्ति : [१२४३-१४१५/१२३१-१४१८], भाष्यं [२०५-२२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता: आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनियुक्ति: एवं जिनभद्रगणिरचिताचूर्णि: 3 ध्ययने प्रत सूत्रांक [सू.] + गाथा ||१२|| ॥१९८॥ अतिक्रमणाय आगतो, निस्सद अंतेपुरति सोवाए निग्गच्छिय वारछिद्देश पलोएति. दिट्ठा विकहति एसो चिंतेति-विण? अंतेउरंति, भणति-15 संवेगः पच्छण्ण होतु, मा भिण्ण रहस्से सहरतराओ होहिंति, मारेतुं मग्गति सुजातं, विभेति, पिता से रणो अच्चितो, मा ततो विणासे ॥१९८ हितिचि उवार्य चितति, लद्धा, अण्णदा कूडलेहेहिं पुरिसा कता, जो मित्तप्पभस्स विपक्खा तण किर सामंतण लेहा विसज्जिता-1 ४ मित्तप्पमं मारेहित्ति सुजानस्स, तुम वीसंमं गतो, ते अद्धं रज्जस्स देज्जिहित्ति, तेण से लेहा आणीता, रण्णो अग्गतो धारिता, दि राया कवितो, तेवि लेहकारका बज्झा आणता, तेण पच्छण्णा कता, मित्तप्पभो चितेति-जदि लोगणातं कजिजहिति तो पउरक्खो भो मे होहितित्ति मम च तस्स रष्णो देज्जा अयसो, उवाएणं मारेमि । तस्स मित्तप्पभस्स एग पच्चतं नगरं अरखुरी नाम, तस्सर चंडज्झयो नाम राया, तस्स लेहं देति, जथा सुजातं पेसेमि तं मारेहित्ति, मुजातं सहावेत्ता भणति-वच्च अरक्षुरितं, तत्थ वितिजिओ होऊण रायकज्जाणि पेच्छाहि, गतो तं नगरि अरकारि नाम, दिहो, अच्छतु वीसत्था तो मारिजिजहिति, दिवे दिये एगट्ठा भिरमति, सो तस्स रूबं संलि समुदायारं च दटूर्ण चितेति-गुणं अंतपुरिए सम विणट्ठा तण मारिज्जति, तो किहएरिसं रूर्व ट्र विणासमित्ति उस्सारता सर्व परिकहेति लेहे च दरिसेति, तेण सुजातेग भणति-जं जाणसि ते करेहित्ति, तेण भणित-न तुम ट्र *मारेमित्ति, एकं करेहि, पच्छण्णो अच्छाहित्ति, तेण चंदजसा भगिणी दिण्णा, सा घि तंदूसिता, तीए सम अच्छति, परिभोगदो ॥१९८॥ 3 सेण वडित, सुजायस्सवि ईसित्ति संकेत, सावि तेण सडी कता, चिंतेति-मम तणएणं एसोवि विणहोत्ति संवेगमावना, भत्ता दापच्चक्खाति, तेण चव निज्जामिता, देवो जातो, ओधी पउंजति, दणं आगता, बदिता भणति-कि करमा, सो संवेगमावण्णो चिंतेति-जदि अम्मापियरो पेच्छेज्जा तो पब्वयामि, तेण देवेण सिला विकुन्त्रिता नगरस्त उवरिं, नागरा पयता धूवहत्था पाद CARRIEREASE दीप अनुक्रम [११-३६] Aceticsk* (211)
SR No.035055
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 06 Aavashyak 3 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages343
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
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