SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 183
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम (४०) भाग-5 "आवश्यक- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+चूर्णि:) 3 अध्ययनं [४], मूलं [सूत्र /११-३६] / [गाथा-१,२], नियुक्ति : [१२४३-१४१५/१२३१-१४१८], भाष्यं [२०५-२२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता: आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनियुक्तिः एवं जिनभद्रगणिरचिताचूर्णि: 3 प्रत सूत्रांक + गाथा: ||१२|| प्रतिक्रमणा सक्करोवणीत पूइयंति मण्णति, चंदणाणुलेवणं मुंमुरं वेदेति, हंसतूलमउई सेज कंटकिसाहासंचयं पडिसंवेदेति, तस्स य तहा- सेचनकध्ययने &ा विहं भावं जाणितण पुरोण से अभयस्स कहितं, ताहे चंदणिकापाणिकं दिज्जति, भणति-अहो मिटुं, मीण य विलिप्पति, पूति-पद मंसाणि से आहारो, एवं किलिस्सितूण मतो अहे सत्तमं गतो । ताहे सयणेण पुत्तो ठविज्जति, सो नेच्छति, मा नरकं जाइस्सामि , ताणि भणंति-अम्हे ते पावं विरिचिस्सामो, तुम नवरं एक मारेहि सेसग सम्बं परिजणो काहिति, तत्थ महिसगो दिक्खिओ कुहाडो य, रत्तचंदणेणं रत्तकणवीरियाहि य दोधि मंडिता, तेण कुहाडेण अप्पो | आहओ मणाग, मुच्छितो पडितो बिलवति य, सयणे भणति- एयं दुक्खं अवणेह, न तीरतित्ति भणितो, तो कह। | भणह-अम्हे तं विरिचिहामोचि , एतं अधिकारेण भणितं । तेण देवेण सेणिकस्स तुडेणं अट्ठारसर्वको हारो दिण्णो दोण्णि यह अक्खाडिमतया दिण्णा, सो हारो चेल्लणाए दिण्णो, बट्टा नंदाए, ताए रुवाए कि अहं चेडरूवत्ति कानूणं खमे आवाडिता, तत्थ टा ही एकमि कुंडलजुयलं एकमि देवदूसजुयलं, तुट्टाए गहिताई, एवं हारो उप्पण्णो । सेयणगस्स उत्पत्ती ___एकत्थ वणे हथिजूह, तमि जूहे एगो हत्थी जाते जाते हस्थिवालये मारेति, एगा हस्थिणिगा गुब्बिणी, सा सणिकं २४ ॥१७॥ ओसरित्ता एकल्लिका चरति, अण्णदा कदाइ तणपिंडगं सीसे कानूणं तावसाणं आवासं गता, तेसिं तावसाणं पाएमु पडिता, तेणं नाणं, सरणागतिका वराईका । अण्णदा तत्थ चरंती वियाता पुन, हथिजूहे चरिचा छिद्देण गंतूर्ण थणकं दातूर्ण जाति, एवं का१७०॥ संवढ़ात, तत्थ तावसपुत्तमा पुष्फजातीओ सिंचंति, सोवि सोडाए पाणितं तूण सिंचति, ताहे से नाम कर्त सेयणउत्ति, संवड़ितो, IM मयकालो जातो, ताहे तेणं सो जूहपती गंतूणं मारितो, अप्पणा जूंह पडिवण्णो। अण्णदा तेहिं ताबसेहिं राजा गाम दाहितित्ति FAE35455 दीप अनुक्रम [११-३६] (183)
SR No.035055
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 06 Aavashyak 3 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages343
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy