SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 104
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम (४०) भाग-5 "आवश्यक- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+चूर्णि:) 3 अध्ययनं [४], मूलं [सूत्र /११-३६] / [गाथा-१,२], नियुक्ति : [१२४३-१४१५/१२३१-१४१८], भाष्यं [२०५-२२७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता: आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [१] आवश्यकनियुक्तिः एवं जिनभद्रगणिरचिताचूर्णि: 3 प्रत सूत्रांक प्रतिक्रमणाला अहवा इमाओ अण्याजो पणवीसं किरियाओ, तंजथा- आरंभिया १ परिग्गहिता २ मायावत्तिया ३ मिच्छादसणक्रिया II क्रियाध्ययन अपच्चक्खाणकिरिया ५ दिद्विवाझ्या ६ पुट्टिवाइया ७ पाडुच्चिया ८ सामंतोवणिवातिया ९ सत्थिया १० साहस्थिया ११ विचार: ॥९ ॥ आणमणिया १२ वेयाराणिया १३ अणाभोगवचिया १४ अणवखवत्तिया १५ पायोगकिरिया १६ समुदाणकिरिया १७ पेज्जपत्तिया १८ दोसवत्तिया १९इरियावहिया चेति २० । एताओ वीसं पुव्वभणिताओ, पंच काइगा अधिकरणक्रिया एवमादिगा, एता पणचीसं ॥ तत्थ आरंभिया द्विविधा-जीवारंभिया अजीवारंमिया, जीये आरंभति अजीवे आरंभतिश्एवं परिग्गहियाथि २ मायावत्तिया द्विविधा- आयर्वचणक्रिया परवंचणकिरिया य ३ मिच्छादसणवत्तिया द्विविधा- आभिग्गहिया य अणाभिग्गहिया य४ अपच्चक्खाणाकरिया द्विविधा-जीवअपच्चक्खाणकिरिया अजीवअपच्चक्खाणकिरिया ५दिहिवाइया दुविधाजीवदिट्ठिया अजीवदिट्ठिया प, जीवदिदिया आसादीण चक्खुदंसणपडियाए, अजीवदिद्विया चित्तकमादीणं पुट्टिया दुविधाजीव० अजीव०, जीवपुहिया जीवाधिगारं पुच्छति रागदासेण, अजीवाधिगारं वा०, अहवा पूट्ठियति फरिसणकिया, सापि जीव० अजीव तहेव७पाइरिचया दुविधा- जीवपा० अजीव०, जीववत्थु पच्च जो बधो सा जीवपादृच्चिया, एवं अजीवपाहुच्चिया ८ सामंतोवणिवाइया समन्तादणुपततीति सामन्तोषणिवाइया, सा दुविधा. जीव० अजीब०, जीवसामंतोवणिवाइया जथा एगस्स संडोतं जणो पलोएति जथा जथा पलोएति तथा तथा सो हरिसं गच्छति । एवं अजीबपि रहकमादिसु ९ नेसत्थिया का दुविधा- जीव० अज्जीव०, जीवणेसस्थिया रायादिसंदेसो जथा दगजंताई, अजीवणेसस्थिया जथा पाहाणकंडादीणि गोफणधणुग मादीहिं निसरति१० साहत्थिया दुविधा-जीव०अजीव०, जीवसाहस्थिया जं जीवेण चेव जीवं आहणति, अजीसाहस्थिया जथा SACRORREN + गाथा: ||१२|| 4-04-982 दीप अनुक्रम [११-३६] (104)
SR No.035055
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 06 Aavashyak 3 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages343
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy