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________________ आगम (४०) भाग-3 “आवश्यक'- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+चूर्णि:) 1 अध्ययनं , मूलं F /गाथा-], श्री नियुक्ति : [४६२-४६४/४६२-४६४], भाष्यं [१११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र-[४०].मूलसूत्र-[१] आवश्यकनियुक्ति: एवं जिनभद्रगणिरचिता चूर्णि:-1 | प्रत आवश्यका सत्राक दीप अनुक्रम श्री भविस्सति ६ जंच सागर तिम्रो तं संसारमुचरिहसि ७ जो य सूरो तमचिरा केवलनाण ते उप्पन्जिहिति ८ च अंतेहिं माणु-14 मुत्सरो वेढितो तं ते निम्मलजसकितिपयावा सयले तिहयणे भविस्सति ९ च मंदरमारुढोसि ते सीहासणथो सदेवमणुयासुराए 218 अस्वमफलाचूर्णी उपोद्घात | परिसाए धम्म पनवेहिसित्ति १० दामदुर्ग पुण ण जाणामि, सामी भणति-हे उप्पला! नं तुम न याणसि तं नं अहं दुविहमगारा-141 मान्दकवृत्त नियतौणगारियं धम्म पनवेहामित्ति ४ ततो उप्पलो वंदिता गतो । तत्थ सामी चचारि मासे अद्धमास खममाणो एत पढम समोसरणी बुच्छो । एत्य इमाओ मूलभासागाहाओ॥२७५| भीमहहास हत्थी पिसाय णागा य वियण सत्तेमा। सिर कन्न णास दंते णहछि पट्ठीय सत्तमिया ४.४१४६५॥13 ताल पिसायं दो कोइला य दामदुगमेव गोवग्गं । सर सागर सूरते मंदर सुविणुप्पले चेव ॥ ४-५॥४॥६६॥ मोहे य झाण पक्षण धम्मे संघ य देवलोगे य । संसारत्ताण जसे धम्म परिसाए मजमि ॥४-६।४६७।। पच्छा सरदे निग्गओ मोरायं नाम सन्त्रिवर्स गओ, तत्थ सामी बहिं उज्जाणे ठिओ, तत्थ य मोरागए सचिवेसे अच्छंदगा-1 | नाम पासडत्था, तत्थ एगो अच्छंदओ तस्थ गामे अच्छइ, सो पुण तत्थ गामे कॉटलवेंटलेण जीवति, सिद्धस्थगो पालो अच्छतओ अद्धिति करेति बहुसंमोइतो य, भगवतो य पूर्य अपेच्छतो, ताहे सो बोलेंतं गोई सद्दावेत्ता वागरेति, जहिं पधावितो ॥२७५॥ जं जिमितो जं पंथे दिह जे य सुविणगा दिडा, ताहे सो आउट्टो गामं गंतु मित्तपरिजिताण परिकहेति, सबहिं गामे फुसितं एस देवज्जतो उज्जाणे अतीतवद्दमाणाणागतं जाणति, ताहे अनोऽवि लोओ आगतो,सब्बस्स वागरेति, लोगो वडेव आउडो महिमंट्री [287]
SR No.035053
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 04 Aavashyak 1 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages320
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size25 MB
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