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________________ आगम (४०) भाग-3 “आवश्यक"- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+चूर्णि:) 1 अध्ययनं 1, मूलं - /गाथा-], नियुक्ति : [२७०.../४६०...], भाष्यं [१०५-११०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र-[४०].मूलसूत्र-[१] आवश्यकनियुक्ति: एवं जिनभद्रगणिरचिता चूर्णि:-1 प्रत सत्राक MI विससेणं ईदएहिं चंदणादिगंधेहि पासितो, अतो तस्स पव्वइयस्स विसेसओ चत्वारि साहिए मासे सो दिवो गंधो ण फिडितोश्रीवीरस्यो आवश्यक अतो से सुरभिगधेणं भमरा मधुकरा य पाणजातीया बहवे दूराओवि पुष्फितेवि लोद्धकुंदादिवणसंडे चतिन्ति, दिव्वेहि मंहिं आग- पसगो | रिसिता तं तस्स देहमागम्म आरुज्म कार्य विहरति विंधति य, केइ मग्गतो गुगुममेंता समबति, जदा पुण किंचिविण साएंति तदा उपोद्घातक नियती आरुसिया पहेहि य मुहेहि य खायंति, वसंतकालेवि किर किचि रोमकूवेसु सिणेहं भवति तदा विलग्गितुं तं पिबित्ता आरुसि-| ताण तस्थ हिसिमु, मुइंगादीवि पाणजातीतो आरुजा कार्य विहरति जाब गाते बत्थे वा चंदणादिविलेवणाणं घुमाईण च केति | ॥२६९। अवयवा धरिता ताव ते खाईसु, तेहिं निट्टिएहिं पच्छा ते ठितस्स वा चक्कर्मतस्स वा आरुट्ठा समाणा कार्य विहिसिसु, जे वा अजितिं दिया ते गंधे अग्घात तरुणइत्ता तग्गंधमुच्छिता भगवंतं भिक्खायरियाए हिंडतं गामाणुग्गाम दूइज्जतं अणुगच्छंता अणुलोमं जायंति-देहि अम्हवि एतं गंधजुत्रिं, तुसिणीए अच्छमाणे पडिलोमे उबसग्गे करेंति, देहि वाहिं वा पेच्छसि, एवं पडिम: ठियपि उवसग्गेति, एवं इस्थियाओऽवि तस्स भगवतो गातं स्यस्वेदमलेहि विरहितं निस्साससुगंधं च मुहं अच्छीणि य निसग्गेण | चेव नीलुप्पलपलासोवमाणि बीयअंसुविरहियाणि दटुं भणंति सामि-कहिं तुब्भे वसहिं उवेह , पुच्छति भणंति अनममाणि, एवं सव्वा चरिया जहा ओहाणसुए 'अहासुर्य बहस्सामी' च्चातिणा तहा विभासियब्बा, एत्थ पुण जत्थ किंचि उवसम्गो वा| २६९॥ बासारत्तो वा कारण वा किंचि तं भन्नति, तए णं भगवतो कम्मारग्गामे बाहिं पडिमं ठियस्स गोवनिमित्तं मक्कस्स आगमो वागरेति देविंदो । कोल्लागवले छट्ठस्स पारणे पयस वसुहारा ॥ ४६१ ॥ तत्थ एगो गोवो सो ला दिवस पइल्ले वाहेत्ता गामसमीर्य पत्तो, ताहे चिंतेति- एते गामसमीवे खेत्ते चरंतु, अहंपि ता गाइओ दोहेमि, सोवि ताव अंतो|M दीप अनुक्रम K S [281]
SR No.035053
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 04 Aavashyak 1 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages320
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size25 MB
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