SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 23
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम (४०) भाग-3 “आवश्यक"- मूलसूत्र-१ (नियुक्ति:+चूर्णि:) 1 अध्ययनं , मूलं - /गाथा-], नियुक्ति: [४], भाष्यं H पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र-[४०] मूलसूत्र-[१] आवश्यकनियुक्ति: एवं जिनभद्रगणिरचिता चूर्णि:-1 प्रत सत्राक है अत्थो तं चैव अण्णमि काले पुणोऽनि संभरति, तत्थ जो सो उग्गहो तं अस्थालोयण भण्णति, अत्थालोयणं णाम जे अत्थस्साहाचा आवश्यक सामण्णण गहणं, सो य उग्गहो दुविहो-अत्थोग्गहो बंजणोग्गहो य, तत्थ अत्थोग्गहो छब्बिहो, तंजहा-सोइदियअयोग्गहो ५ मतिमेदाः चूर्णी चक्खुईदियअत्थोग्गहो पाणिदियअत्यो जिभिदियअत्थो० फासेंदियअत्थो० गोइदियअस्थो०, बंजणोग्गहो पुण चउबिहो, तंजहाज्ञानानि सोईदियवंजणोग्गहो पाणिदिय जिभिदिय० फासिंदियाईहाअवायधारणाओवि एवं चेव छव्विहाओ, चउब्बिहाओ ण भाणिय॥११॥ व्याओ ॥३॥ इयाणि एतसि उग्गहाईण चउण्हं दाराणं वित्थरतरएण कालस्स परूवणत्थं इमं गाहासुत्तं भण्णा, जहा-. उग्गह एक्कं समयं०॥४॥ एत्थ पुष्वं ता उग्गहस्स परूवणं करिस्सामि दोहि दिडतेहि, तंजहा- पडिचोहगदितण | मल्लगदिढतेण य । से किं तं पडिबोहगदिद्रुतणी, २ से जहा नामए के पुरिसे सुतं पुरिसं पडियोहिज्जा 'अम्बया अमुय'त्ति, तत्थ | चोदए पण्णवर्य एवं वयासी-कि एगसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छति दुसमय तिसमय जाब दससमय० संखेम्जसमय. असंखेज्जसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छति ?, एवं वदंतं चोदयं पण्णवए एवं बयासी णो एगसमयपविद्वा पोग्गला गहणमागच्छति जाव णो संखेज्जसमयपविट्ठा०, असंखेज्जसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छति, जहा को दिढतो?, से जहा णाम एकेड पुरिसे आवागसीसाओ मल्लग गहाय तत्थ एग उदयबिंदु पक्विचिज्जा, से गढे, गहित्ति वा विगएत्ति वा अतथाभूपत्ति वा[४ | एगट्ठा, अण्णं पक्षिवेज्जा, सेचि णद्वे, अण्णपि, सेवि गडे, एवं पक्षिप्पमाणेहिं २ होहिति से उदगर्चिदू जेणं त मल्लगं रावेहिति, होहिति से उदगविंदू जे मल्लर्ग पवाहेहित्ति, एवामेव कलंचुयापुष्फसंठियं सोईदियं तं जाहे अणंतेहिं पोग्गलेहिं पूरितं भवति ताहे| ट्राति करेइ, ण पुण जाणति केवि एस सहाति, एस एगसमहओ सोइंदियओग्गहो भण्णइ, ततो अंतोमुहुत्तियं ईहे पविसइ, जहाहा KA4%AXI दीप अनुक्रम [23]
SR No.035053
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 04 Aavashyak 1 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages320
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy