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________________ आगम (४०) [भाग-३१] "आवश्यक"- मूलसूत्र-१/४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [४], मूलं [सू.] / [गाथा-], नियुक्ति : [१३९७] भाष्यं [२२३...] प्रत सत्राक भावश्यक- कारणतो ण सुज्झति वा पाओसिएण वा सुपडियग्गिएण पढंति न गेण्हंति, बेरत्तियं कारणओ न गिण्हति न सज्झइ | ४प्रतिक्रहारिभ-18वा, पाओसिय अहरत्तेण वा पढेति, तिन्नि वा णो गेण्हंति, पाभाइयं कारणओ न गिण्हइ न सुज्झइ वा बेरत्तिएणेव दिव-1 मणाध्य द्रीया सओ पढंति ॥ १३९७ ॥ इयाणि पाभाइयकालग्गहणविहिं पत्तेयं भणामि अस्वाध्यापाभाइयकालंमि उ संचिक्खे तिन्नि छीयकनाणि । परवयणे खरमाई पावासुय एवमादीणि ॥ १३९८ ॥ दियनियुक्तिः ७५४|| व्याख्या त्वस्या भाष्यकारः स्वयमेव करिष्यति । तत्थ पाभाइयंमि काले गहणविही पट्टवणविही य, तथ। गहणविही इमानवकालवेलसेसे उबग्गहियअट्ठया पडिक्कमह । न पडिकमइ वेगो नववारहए धुवमसज्झाओ! (भा०२२४)। व्याख्या-दिवसओ सज्झायविरहियाण देसादिकहासंभवव जणहा मेहावीतराण य पलिभंगवजणवा, एवं सवेसिमणुग्गहहा नवकालग्गहणकाला पाभाइए अणुण्णाया, अओ नवकालग्गहणवेलाहिं सेसाहिं पाभाइयकालग्गाही दीप अनुक्रम [२९] ॥५४॥ कारणतो न शुध्यति वा, पादोषिकेण वा सुपतिजागरितेन पठन्ति न गृह्णन्ति, वैरात्रिक कारणतो न गृहन्धिान शुभपति वा, प्रादोविकारात्रिकाभ्यामेव पठन्ति, श्रीन् वा न गृहन्ति, प्राभातिक कारणतो न गृहाति न शुध्यति बा, बैरात्रिकेणव दिवसे पठस्ति । इदानीं प्राभातिककानप्रहणविधि पृथक भगामि-त्र प्राभातिके काले प्रहणविधिः प्रस्थापनविधिक्ष-तत्र महणविपिरय-दिवसे खाध्यायविरहितानां देशादिकथासंभववर्जनाय मेधाविनाभितरेषां काचविपर्जनार्थ, एवं सर्वेषामनुमहापांच नवकालप्राणकालाः प्राभातिकेऽनुज्ञाताः, अतो नवकासपाहणबेलामु शेषासु प्राभातिककासपाही पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[४०] मूलसूत्र-[१] आवश्यक मूलं एवं हरिभद्रसूरि-रचिता वृत्ति: ~198~
SR No.035031
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 31 Aavashyak Mool evam Vrutti Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size90 MB
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