________________
आगम (१८)
“जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्तिः ) वक्षस्कार [७],-----------------...........
------ मूलं [१३२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति:
प्रत सूत्रांक [१३२]
दीप अनुक्रम [२५७]
gesekeckeweceo
जंयुरी दीवे सबभतरेण भंते ! सूरमंडले केवइ आयामविक्खमेणं केवइ परिक्खेवेणं पण्णत्ते ?, गो०! णवणउई जोअणसहस्साई उच पत्ताले जोअणसए आयामचिक्खंभेणं तिष्णि य जोअणसयसहस्साई पण्णरस व जोअणसहस्साई एगणणतई प ओभणाई किंचिविसेसाहिआई परिक्षेवणं, अग्भंतराणतरेण भंते ! सूरमंडले केवइ आयामविक्खंभेणं केवइ परिक्षण पण्णत्ते ?, गोमा? णवणउई जोअणसहस्साई छच्च पणयाले जोअणसए पणतीसं च एगसहिभाए मोअगस्स आयाम विक्खंभेणं तिणि जोमणसयसहस्साई पण्णस्स य जोअण सहस्साई एगं सत्तुत्तरं जोअणसय परिक्खेवेणं पण्णत्ते, अम्मतरतचे णं भंते ! सूरमंडले केवइ आयामविक्खंभेणं केवइ परिक्खेवणं प०१, गो० ! गवणउई जोअणसहस्साई छश्च एकावण्णे जोअणसए णव य एगसविभाए जोअणस्स आयामविक्वंभेणं तिष्णि अ जोअणसयसहस्साई पण्णरस जोअणसहस्साई एगं च पणवीसं जोअणसय परिक्षेवणं, एवं खलु एतेणं उवाएणं णिक्खममाणे सूरिए तथाणंतराओ मंडलाओ तयाणतरं मंडलं उबसंकममाणे २ पंच २ जोभणाई पणतीसं च एगसद्विभाए जोमणस्स एगमेगे मंडले विक्खंभवुद्धिं अभिवर्तमाणे २ अट्ठारस २ जोअणाई परिरयबुद्धि अभिवद्धेमाणे २ सम्बबाहिर मंडलं उपसंकमित्ता चार परइ सम्बवाहिरए ण भंते! सूरमंडले फेवइ आयामविक्खंभेणं केवइ परिक्खेवणं पण्णते', गो! एर्ग जोयणसयसहस्सं छच सट्टे जोअणसए आयामविक्खंभेणं तिणि अ जोअणसवसहस्साई अट्ठारस य सहस्साई विणि अ पण्णरसुत्तरे जोअणसए परिक्खेवणं, बाहिराणंतरेण भंते ! सूरमंडले केवइ आयामविक्खंभेणं केवइ परिक्खेवणं पण्णत्ते', गोअमा! एगं जोअणसयसहस्सं छच चउपण्णे जोअणसए छन्वीसं च एगसद्विभागे जोअणस्स आयामविक्खंभेणं तिण्णि अ जोअणसयसहस्साई अट्ठारस य सहस्साई कोण्णि य सत्ताणउए जोअणसए परिक्खेवेणंति, बाहिरतथे णं भंते ! सूरमंडले केबइअं आयामविक्खंभेणं
~121