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________________ आगम (१८) “जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति" - उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्ति:) वक्षस्कार [३], ------------------------ ------ मूलं [४९] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति: प्रत 18| दिति, प्रभासनामतीर्थ यत्र सिन्धुनदी समुद्रं प्रविशति, अथ ताहक चक्ररत्नं दृष्ट्वा यन्नुपश्चके तदाह-तए णमित्यादि, सर्व पूर्ववत् , परं प्रीतिदाने विशेषः, तमेव च सूत्रे दर्शयति-णवरि'त्ति नवरं माला-रत्नमालां मौलिं-मुकुट मुक्ता-1 | जालं-दिव्यमौक्तिकराशि हेमजालं-कनकराशिमिति, 'सेसं तहेव'त्ति शेष-उक्तातिरिक्तं प्रीतिदानोपढौकनस्वीकरण-18 1% सुरसन्माननविसर्जनादि तथैव-मागधसुराधिकार इव वक्तव्यं, आवश्यकचूर्णौ तु वरदामप्रभाससुरयोः प्रीतिदानं | व्यत्यासेनोक्तमिति । अथ सिन्धुदेवीसाधनाधिकारमाह तए णं से दिवे चक्करयणे पभासतिस्थकुमारस्स देवस्स अट्ठाहिआए महामहिमाए णिवत्ताए समाणीए आउधरसालाओ पडिणिक्खमइ २ चा जाव पूरेते चेव अंबरतलं सिंधूए महाणईए दाहिणिलेणं कूलेणं पुरच्छिमं दिसि सिंधुदेवीभषणाभिमुहे पवाते. आवि होत्था । तए णं से भरहे राया तं दिवं चक्करयणं सिंधूए महाणईए दाहिणिलेणं कूलेणं पुरथिम दिसि सिंधुदेवीभवणाभिमुहं पयातं पासइत्ता हडतुडचित्त सहेब जाव जेणेव सिंधूए देवीए भवणं तेणेव उवागच्छइरत्ता सिंधूए देवीए भवणस्स अदूरसामते दुवालसजोअणायाम णवजोयणविपिछण्णं वरणगरसारिच्छं विजयखंधावारणिवेस करेइ जाब सिंधुदेवीए अट्ठमभत्तं पगिणइ २ त्ता पोसहसालाए पोमहिए बंभयारी जाव दम्भसंथारोवगए अट्ठमभत्तिए सिंधुदेवि मणसि करेमाणे चिट्ठा । तए णं तस्स भरहस्स रणो अहमभसि परिणममाणसि सिंधूए देवीए आसणं चला, लए णं सा सिंधुदेवी आसणं चलिअं पासह २सा ओहि पाउंजइर प्ता भरह रायं ओहिणा आभोपइ२त्ता इमे एआरूवे अभथिए चिंतिए पथिए मणोगए संकप्पे समुप्पज्जित्था-उप्पण्णे खलु भो जंबुद्दीवे दीवे भरहे बासे भरहे णाम राया चाउरतचकवट्टी, तंजीअमेअंतीअपप्पण्णमणागयाणं सिंपूर्ण देवीर्ण भरहाणं राईणं अनुक्रम [७३] seneed Snilon अथ सिन्धुदेवी साधना-अधिकार: वर्तते ~82
SR No.035024
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 24 Jambudwippragyapti Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jambudwipapragnapti
File Size104 MB
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