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आगम (१८)
“जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्तिः )
वक्षस्कार [3], ------------------------------------------------------ मुलं [४७] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति:
प्रत
एकाशीतिपदवास्तुन्यासः॥ चतुपरिपरवान्यास
शतपदवास्तुन्वासः॥ वर हा प. ज.। इलाम १ स.न. म. पिपर था. प. ज. ) हास् १ स.काकाका कवर है. प. १ ज.। ।३१म् । स. ११न यावि
सूत्रांक
अपव
को
अपचलावि.
दा
बर्यमा
(४७)
सो. पृथ्वीवर अमादेवः विवस्वा.
पृथ्वीधर मझा देव विवस्वा.
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गाथा:
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यशो ..भ.
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1.सु.पि.पूत पारो. यशो .
ज.पु.म.वी. पि. पपा
म.
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दीप अनुक्रम [६८-७२]
एतत्संवादनाय सूत्रधारमण्डनकृतवास्तुसारोक्तिरपि लिख्यते, यथा-"चतुःपया पदैर्वास्तु, पुरे राजगृहेऽर्चयेत् ।। एकाशील्या गृहे भागः, शतं प्रासादमण्डये ॥१॥ ईशा १ पर्जन्यो २ ज ३ न्द्री ४, सूर्यः ५ सत्यो । भृशो
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