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________________ आगम (१८) “जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्ति:) वक्षस्कार [४], ----------------------- ------ मूलं [७८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७८] 8 हेम-प्रकाशयति, ततो हेम नित्ययोगि प्रशस्य वाऽस्यास्तीति हेमवत् हेमवदेव हैमवतम् , प्रज्ञादेराकृतिगणतया 'प्रज्ञा दिभ्यः' (श्रीसिद्ध० अ०७-पा० २ सू०१६५) इति स्वार्थेऽण प्रत्ययः, हैमवतश्चात्र देवो महर्बिकः पल्योपमस्थि- |तिक परिवसति, तेन तद्योगाद्धैमवतमिति व्यपदिश्यते, हैमवतो देवः स्वामित्वेनास्यास्तीत्यभ्रादित्वादप्रत्यये वा॥ अथास्यैवोत्तरतः सीमाकारी यो वर्षधरगिरिस्तं विचक्षुराह कहि ण भन्ते ! जम्बुदरीचे २ महाहिमवन्ते णाम वासहरपध्वए पं०१, गो०/ हरिवासस्स दाहिणेणं हेमवयस्स चासस्स सत्तरेण . पुरथिमळवणसमुहस्स पञ्चत्थिमेण पञ्चत्थिमळवणसमुदस्स पुरथिमेणं, एत्थ ण जम्बुद्दीवे वीवे महाहिमवंते णाम वासहरपञ्चए पण्णत्ते, पाईणपढीणायए उदीणवाहिणविच्छिण्णे पलियकसंठाणसंठिए दुहा लवणसमुदं पुढे पुरथिमिल्लाए कोडीए जाब पुढे पञ्चस्थिमिल्लाए कोडीए पञ्चथिमिलं लवणसमुदं पुढे दो जोअणसयाई उद्धं उचशेणं पण्णास जोषणाई उब्बेहेणं चत्तारि जोअणसहस्साई दोष्णि अ दसुत्तरे जोअणसए दस य एगणकीसइभाए जोअणस्स विक्खमेणं, तस्स बाहा पुरथिमपञ्चस्थिमेणं णव जोअणसहस्साई दोणि अ छावत्तरे जोअणसए णत्र य एगूणवीसइभाए जोअगस्स अद्धभागं च आयामेणं, तस्स जीवा उत्तरेणं पाईणपडीणायया दुहा लवणसमुई पुट्ठा पुरथिमिल्लाए कोडीए पुरथिमिल्लं लवणसमुई पुट्ठा पचस्थिमिल्लाए जाब पुट्टा तेवण्णं जोअणसहस्साई नव य एगतीसे जोमणसए छच्च एगूणवीसइभाए जोअणस किंचिविसेसाहिए आयामेणं, तस्स घणु वाहिणणं सचायण्णं जोजणसहस्साई दोणि अ तेणउए जोअणसए दस य एगूणवीसइभाए जोअणस्स परिक्खेवेणं, रुअगसंठाणसंठिए सवरय दीप अनुक्रम [१३३] Recenel औजम्मू. ५१ ~256
SR No.035024
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 24 Jambudwippragyapti Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jambudwipapragnapti
File Size104 MB
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