SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 193
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम (१८) “जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्ति:) वक्षस्कार [३], ----------------------- ------ मूलं [६८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति: श्रीजम्द्वीपशान्तिचन्द्रीया चिः ॥२६९॥ श्वक्षस्कारे भरतस्य चक्रवर्ति प्रत वाभिषेक सुत्रांक [६८] रता करयल जाब अंजलि को भरहं रायार्ष जएणं विनरण वाति महसणी णवासले जाइब ससुसमामा जाव पञ्जुवासंति, तए णं तस्स भरहस्स रणो सेणावहरयणे जाव सत्ववाहनामिईओ तेऽवि तह चेव ण दाहिणिही तिसीवाणपखिरूबएणं जाव पञ्जुमासंति, तए से भरहे राया आमिओगे देवे सदावेद २ एवं बवासी-खिप्पमिष भी देवाणुष्पिमा! ममं महत्थं महग्धं महरिहं महारायाअमिसेमै उवट्ठवेह, तए 4 ते आमिओविश्य देवा भरहेणं रण्णा एवं वुत्ता समाणा हहतुहुचिता जाव पत्तरपुरस्थिम दिसीभार्ग अवकमंति अवक्कमित्ता केउचिअसमुग्याएवं समीणति, एवं जहा विजयस्स हा इल्यान नाव पंचगवणे एगओ मिलायंति एगओ मिलाइत्ता जेणेव दाहिणभरहे वासे जेणेव विपीया राबहाणी तैष स्वागच्छति २ सा चिणीभं रावहाणि अणुप्पयाहिणीकरेमाणा २ जेणेच अमिसेअमंडये जेणेव भरहे गया तेणेव ज्यागच्छति २ सा तं गहत्य महग्धं महरिई महाराथामिसेअं उपवेंति, तए णं वं मरह रावाणं बत्तीस रावसहस्सा सोमणसि तिहिकरणदिवसणक्खत्तमुहससि उत्तरपोट्टवयाविजयंसि तेहिं साभाविपहि अ उत्तरवेउन्विएहि अ वरकमलपाटाणेहिं सुरभिकरवारिपडिपुण्णेहिं जाय महा महया रायामिसेएणं अभिर्सिचंति, अंमिसेओ जहा विजयस्स, अमिर्सिचित्ता पचे २ जाव अंजॉल कटु ताहि इटाहिं जहा पविसंतस्स भणिआ जाब विहराहित्तिकटु जयजयसई पर्यजति । तए णं है भरई रायाणं सेणावइरयणे जाव पुरोहियरयणे तिणि म सहा सूअसया अट्ठारस सेणिप्पणीओ अण्णे अ बहवे जाब सत्ववाहप्पमिइली एवं व भनिसियति तेहिं परकमलपंइटाणेहिं तहेव जाव अमिथुर्णति अ सोलस देवसहस्सा एवं ष णवर पम्हसुकुमालाए जाव मउई पिणद्वेति, तयणंतरं च दुहरमलयसुगंधिपहिं गंधेहिं गायाई अम्भुक्छेति दिन्वं च सुमणोदामं पिणद्धेति, किं बाहुणा !, गहिमवेढिम जाप विभूसिर्भ enecessesses दीप अनुक्रम [१२२] 8 ॥२६९॥ ~193
SR No.035024
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 24 Jambudwippragyapti Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jambudwipapragnapti
File Size104 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy