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________________ आगम (१८) “जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्ति:) वक्षस्कार [३], ----------------------- ------ मूलं [१४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [१४] टीप सबभयविप्पमुक्को, त मणिरयणं गहाय से गरवई हत्थिरयणस्स दाहिणिलाए कुंभीए णिक्खिया, तए णं से भरहादिवे गरिदे हारोत्थए सुकयरइअवच्छे जाव अमरवइसण्णिभाए इडीए पहिअकित्ती मणिरयणकउनोए चक्करयणदेसिअमग्गे अणेगरायसहस्सागुआयमग्गे महयाउकिट्ठसीहणायबोलकलकलरवेणं समुदरवभूअंपिव करेमाणे २ जेणेव तिमिसगुहाए दाहिणिले दुवारे तेणेव उवागाइ २ ता तिमिसगुहं दाहिणिल्लेणं दुबारेणं अईइ ससिब मेहंधयारनिवहं । तए णं से भरहे गया छत्तलं दुवालससि अट्ठकणिों अहिंगरणिसंठिों अटुसोवणिों कागणिरयणं परामुसइत्ति । तए णं तं चउरंगुलप्पमाणमित्तं असुवणं च विसहरणं अउलं चउरंससंठाणसंठिों समतलं माणुम्माणजोगा जतो लोगे चरति सधजणपण्णवगा, ण इव चंदो ण इव तत्व सूरे : ण इव अग्गी ण इव तत्थ मणिणो तिमिरं णासेंति अंधयारे जत्थ तयं दिवं भावजुत्तं दुवालसजोषणाई तस्स लेसाउ विवद्धति तिमिरणिगरपडिसेहिआओ, रत्तिं च सबकालं संधाबारे करेइ आलोभ दिवसभूशं जस्स पभावेण चकवट्टी, तिमिसगुई अतीति सेण्णसहिए अभिजेतुं वितिअमद्धभरहं रायवरे कागणिं गहाय तिमिसगुहाए पुरच्छिमिल्लपचाथिमिल्लेर्मु कडएसुं जोअर्णतरिआई पंचधणुसयविक्खंभाई जोअणुज्जोअकराई चवणेमीसंठिभाई चंदमंडलपखिणिकासाई एगूणपणं मंडलाइं आलिहमाणे २ अणुप्पविसइ, तए णं सा तिमिसगुहा भरहेणं रण्णा तेहिं जोअणंतरिपहिं जाव जोअणुजोअकरेहिं एगूणपण्णाए मंडलहिं आलिहिजमाणेहिं २ सिप्पामेव आलोगभूमा उजोअभूआ दिवसभूना जाया बावि होत्था (सूत्र-५४) 'तए णं से भरहे राया मणिरयण'मित्यादि, ततः स भरतो राजा मणिरतं परामृशति, किंविशिष्ट इत्याह अनुक्रम [७८] Reacheseeबल ~104
SR No.035024
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 24 Jambudwippragyapti Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jambudwipapragnapti
File Size104 MB
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