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________________ आगम (१६) सूर्यप्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) प्राभृत [१], -------------------- प्राभृतप्राभृत [१], ------------ ----- मूलं [११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [१६] उपांगसूत्र- [१] "सूर्यप्रज्ञप्ति मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूर्यप्रज्ञ- प्तिवृत्तिः (मल.) सूत्रांक -* दोसि अहोरसि बाहिरं तच्चं मंडलं उवसंकमित्ता चार चरति, ता जया णं सूरिए बाहिरं तचं मंडलं उव-४१माभृते संकमित्ता चारं चरति तदा णं अट्ठारसमुहत्ता राती भवति च रहिं एगहिभागमुहुत्तेहिं ऊणा, दुवालसमुहुत्ते दिवसे भवति चाहिं एगहिभागमुहुत्तेहिं अहिए। एवं खलु एतेणुचाएणं पविसमाणे सूरिए तदाण- प्राभृत तरातो तयाणतरं मंडलातो मंडलं संकममाणे दो दो एगहिभागमुहुत्ते एगमेगे मंडले रतणिखेत्तस्स णिबुड्डेमाणे २ दिवसखेत्तस्स अभिवढेमाणे २ सयभंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति, ता जया णं सूरिए सबबाहिराओ मंडलाओ सबभंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरति तदा णं सबवाहिरं मंडलं पणिधाय एगेणं तेसीएणं राइंदियसतेणं तिन्नि छावठे एगट्ठिभागमुहुत्तसते रयणिखेत्तस्स निवुद्वित्ता दिवसखेत्तस्स अभिवद्वित्ता चारं चरति तथा णं उत्तमकट्टपत्ते उक्कोसए अट्ठारसमुहुत्ते दिवसे भवति, जहणिया दुवालसमुहुत्ता राती भवति, एस णं दोचे छम्मासे एस णं दुच्चस्स छम्मासस्स पजवसाणे, एस णं आदिचे संवच्छरे एस णं आदिचस्स संवच्छरस्स पज्जवसाणे, इति खलु तस्सेवं आदिचस्स संवच्छरस्स सह अट्ठारसमुहुत्ते कादिवसे भवति, सई अट्ठारसमुदत्ता राती भवति, सईदवालसमहत्ता राती भवति, पढमे छम्मासे अस्थिर अट्ठारसमुहुत्ते दिवसे अस्थि दुवालसमुहुत्ते दिवसे नस्थि दुवालसमुहुत्ता राई अस्थि दुवालसमुहूत्ता राई नस्थि दुवालसमुहत्ते दिवसे भवति, पढमे वा उम्मासे णत्थि पण्णरसमुहत्ते दिवसे भवति, णत्थि पण्णरसमुहुत्ता अनुक्रम [२१] 9-24-2 ॥१. ~34~
SR No.035021
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 21 Sooryapragyapti Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages610
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_suryapragnapti
File Size132 MB
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