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________________ आगम (१५) “प्रज्ञापना" - उपांगसूत्र-४ (मूलं+वृत्ति:) पदं [११], --------------- उद्देशक: -1, -------------- दारं -1, -------------- मूलं [१६१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१५]उपांगसूत्र-[४] "प्रज्ञापना" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [१६१] प्रज्ञापना-धिनी, आराधिनी चासौ विराधिनी च आराधनविराधिनी, कर्मधारयत्वात् पुंवभावः, आराधनविराधिनीत्वाच११भाषाया: मल- सत्यामृपा, या तु नैवाराधनी तलक्षणविगमात् नापि विराधिनी विपरीतवस्त्वभिधानाभावात् परपीडाहेतुत्वाभावा- पद य०वृत्ती. च नाप्याराधनविराधिनी एकदेशसंवादविसंवादाभावात् , हे साधो ! प्रतिक्रमणं कुरु स्थण्डिलानि प्रत्युपेक्षखेत्या॥२४८॥ |दिव्यवहारपतिता आमन्त्रिण्यादिभेदभिन्ना सा असत्यामृषा नाम चतुर्थी भाषा, से एएण?ण मित्याद्युपसंहारवाक्यं ॥ इह यथावस्थितवस्तुतत्त्वाभिधायिनी भाषा आराधिनीत्वात् सत्येत्युक्तं, ततः संशयापनस्तदपनोदाय पृच्छति अह भंते! गाओ मिया पमू पक्खी पण्णवणीणं एसा भासा ण एसा भासा मोसा, हंता गो! जा य गाओ मिया पम् पक्खी पण्णयणी णं एसा भासा, [पण्णवणी] ण एसा भासा मोसा, अह भंते ! जा य इत्थीवऊ जा य पुरिसबऊ जा यणपुंसगवऊ पण्णवणी णं एसा भासा ण एसा भासा मोसा, हंता गो०! जा य इत्थीवऊ जा य पुमवऊ जा य नपुंसगवऊ पण्णवणी णं एसा भासा न एसा भासा मोसा, अह भंते ! जा य इथिआणमणी जा य पुमआणवणी जा य नपुंसगआणमणी पणवणी णं एसा भासा ण एसा भासा मोसा, हंता गो०जा य इथिआणवणी जा य पुमआणवणी जा य नपुंसगआणवणी पण्णवणी णं एसा भासा न एसा भासा मोसा । अहं भंते ! जा य इत्थिपण्णवणी जा य पुमपण्णवणी ॥२४॥ जाय नपुंसगपण्णवणी पण्णवणी णं एसा भासा ण एसा भासा मोसा, हंता गो! जा य इत्थिपण्णवणी जा य पुमपण्णवणी जा य नपुंसगपण्णवणी, पण्णवणी णं एसा भासा ण एसा भासा मोसा, अह भंते ! जा जायीति इथिवऊ Reseatseeeee दीप अनुक्रम [३७५] एeceseeneceneces ~100~
SR No.035019
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 19 Pragyapana Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages514
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_pragyapana
File Size109 MB
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