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________________ आगम (१४) [भाग-१७] “जीवाजीवाभिगम” – उपांगसूत्र-३/२ (मूलं+वृत्तिः ) प्रतिपत्ति: [३], ---------------------- उद्देशक: [(इन्द्रियविषयाधिकार)], --------------------- मूलं [१९१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित...आगमसूत्र-[१४] उपांगसूत्र-[३] "जीवाजीवाभिगम" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक 24.COM [१९१] सुफासपरिणामे य दुफासपरिणामे य ॥ से नूर्ण भंते! उच्चावएसु सहपरिणामेसु उच्चाबएसु रूबपरिणामेसु एवं गंधपरिणामेसु रसपरिणामेसु फासपरिणामेसु परिणममाणा पोग्गला परिणमतीति बत्सवं सिया?, हंता गोयमा! उच्चावएसु सहपरिणामेसु परिणममाणा पोग्गला परिणमंतिसि वत्तब्वं सिया, से गुणं भंते! सुन्भिसद्दा पोग्गला दुन्भिसत्ताए परिणमंति तुभिसहा पोग्गला सुब्भिसत्ताए परिणमंति?, हंता गोयमा! सुम्भिसद्दा दुब्भिसहत्ताए परिणमंति दुन्भिसद्दा सुन्भिसहत्ताए परिणमंति, से पूर्ण भंते ! सुरुवा पुग्गला दूरूवत्ताए परिणमंति दुरूवा पुग्गला सुरूवत्ताए०१, हंता गोयमा०!, एवं सुब्भिगंधा पोग्गला दुन्भिगंधत्ताए परिणमंति दुम्मिगंधा पोग्गला सुम्भिगंधत्ताए परिणमंति?, हंता गोयमा०1 एवं सुफासा दुफास ताए, सुरसा दूरसत्ताए०१, हंता गोयमा ! ।। (सू०१९१) 'कइविहे णं भंते !' इत्यादि, कतिविधो भदन्त ! इन्द्रियविषयः पुद्गलपरिणामः प्रज्ञमः, भगवानाह-गौतम ! पञ्चविध इन्द्रियविषयः पुद्गलपरिणामः प्राप्तः, तद्यथा-श्रोत्रेन्द्रियविषय इत्यादि सुगम, 'सुम्भिसद्दपरिणाम' इति शुभः शब्दपरिणामः 'दुब्भिसदपरिणामे' इति अशुभ: शब्दपरिणामः ॥ 'से गुणं भंते !' इत्यादि, अथ 'नूनं निश्चितमेतद् भदन्त ! 'उच्चावचैः' उत्तमाधमैः | शब्दपरिणामैयोवस्पर्शपरिणामैः परिणमन्त: पुद्गलाः परिणमन्तीति वक्तव्यं स्यात् ?, परिणमन्तीति ते वक्तव्या भवेयुरित्यर्थः, भगवा-10 नाह-'हन्ता गोयमा!' इत्यादि, हन्तेति प्रत्यवधारणे स्वादेव वक्तव्यमिति भावः, परिणामस्य यथावस्थितस्य भावात् , तथा तथा दीप अनुक्रम [३०६] -09 ~295
SR No.035017
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 17 Jivajivabhigam Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages488
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jivajivabhigam
File Size118 MB
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