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________________ आगम (१४) [भाग-१७] “जीवाजीवाभिगम” – उपांगसूत्र-३/२ (मूलं+वृत्तिः ) प्रतिपत्ति : [३], ----------------------- उद्देशकः [(द्वीप-समुद्र)], -------------------- मूलं [१४०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित...आगमसूत्र-[१४], उपांगसूत्र-३] "जीवाजीवाभिगम" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रतिपत्ती प्रत सूत्रांक [१४० श्रीजीवाजीवाभि मलयगिरीयावृत्तिः तिर्यगधि| कारे सिहायतन वर्णनं | उद्देशः२ |सू०१४० ॥२३५॥ अजोयणं पाहल्लेणं सब्वमणिमया अच्छा ॥ तीसे णं मणिपेढियाए उपि एस्थ णं महं एगे सीहासणे पण्णते, सीहासणवषणओ अपरिवारो ।। तत्थ णं विजयस्स देवस्स सुबहु अभिसेके भंडे संणिक्खित्ते चिट्ठति, अभिसेयसभाए उपि अवमंगलए जाव उत्तिमागारा सोलसविधेहिं रयणेहिं तीसे णं अभिसेयसभाए उत्तरपुरस्थिमेणं एस्थ णं एगा महं अलंकारियसभावत्तब्वया भाणियब्या जाव गोमाणसीओ मणिपेडियाओ जहा अभिसेयसभाए उप्पि सीहासणं स(अ) परिवारं ।। तस्थ णं विजयस्म देवस्स सुबहु अलंकारिए भंडे संनिक्खित्ते चिट्ठति, उत्तिमागारा अलंकारिय० उपि मंगलगा झया जाव (छत्ताइछत्ता)।तीसे णं आलंकारियसहाए उत्तरपुरस्थिमेणं एस्थ णं एगा महं ववसातसभा पण्णत्ता, अभिसेयसभावत्तब्वया जाव सीहासणं अपरिवार ॥त(ए)स्थणं विजयस्स देवस्स एगे महं पोत्थयरयणे संनिक्खित्ते चिट्ठति, तत्व ण पोत्थयरयणस्स अयमेयारवे यणावासे पन्नत्ते, तंजहा--रिहामतीओ कंचियाओ [रयतामताति पत्तकाई रिहामयातिं अक्खरा] तवणिजमए दोरेणाणामणिमए गंठी (अंकमयाई पत्ताह) वेरुलियमए लिप्पासणे तवणिजमती संकला रिट्ठमए छादने रिटामया मसी बहरामयी लेहणी रिट्ठामयाई अक्खराई धम्मिए सत्धे ववसायसभाए णं उप्पि अदृहमंगलगा झया छत्तातिछत्ता उत्तिमागारेति । तीसे णं दीप अनुक्रम [१७८] ॥२३५॥ अत्र मूल-संपादने शिर्षक-स्थाने एका स्खलना वर्तते-द्वीप-समुद्राधिकार: एक एव वर्तते, तत् कारणात् उद्देश:- '२' अत्र २ इति निरर्थकम् सिद्धायतन अधिकारः, शाश्वत-जिनप्रतिमा अधिकार: ~18~
SR No.035017
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 17 Jivajivabhigam Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages488
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jivajivabhigam
File Size118 MB
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