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________________ आगम (१३) [भाग-१५] “राजप्रश्नीय” – उपांग सूत्र-२ (मूलं+वृत्तिः ) --------- ------------------------- मलं २०-२३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [१३] उपांगसूत्र- [२] "राजप्रश्नीय" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक २०-२३] दीप अनुक्रम [२०-२३] यस्याः सा तथा तस्याः, 'महतिमहालियाए परिसाए । अतिशयेन महत्या पर्षदः 'ओहवले' इति ओघेन-प्रबाहेण बलं यस्य, नतु कथयतो बलहानिरुपजायते इति भावः, ‘एवं जहा उपवाइए तहा भाणियबमिति, एवं यथा औपपातिके ग्रन्थे तथा वक्तव्यं, तच्चवं-'अइबले महावले अपरिमियबलबीरियतेयमाहप्पकंतिजुत्ते सारदनवथणियमहुरगंभीरकुंचनिग्योसदुंदुभिस्सरे उरेवित्थडाए कंठेबवियाए सिरेसमावनाए अगरलाए अमम्मणाए फुडविसयमहुरगंभीरगाहिगाए सब्बक्खरसनिवाइयाए गिराए सब्बभासाणुगामिणीए सव्वसंसयविमोयणीए अपुणरुत्ताए सरस्सईए जोयणनीहारिणा सरेणं अद्धमागहाए भासाए भासइ, अरिहाधम्म परिकहेइ, तंजहा-अस्थि लोए अस्थि अलोए अस्थि जीवे अस्थि अजीवेत्यादि, तावत् यावत् तए णं सा महइमहालिया मणुस्सपरिसा समणस्स भाभगवतो महावीररस अंतिए धम्म सोचा निसम्म हतुवा समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेइ करिता बंदइ । | नमसइ २ ता एवं बयासी-सुयक्खाए णं भंते ! निग्गंथे पावयणे, नस्थि णं कई समणे माहणे वा एरिसं धम्ममा | इक्खित्तए, एवं वदत्ता जाम्व दिसि पाउब्भूता तामेव दिसि पडिगया । तए णं सेए राया समणस्स भगवतो महावीरस्स अंतिए धम्मं सोचा निसम्म हद्वन्तुचित्तमाणदिए जाव हरिसवसविसप्पमाणहियए समणं भगवं महावीरं बंदर नमसइ वंदित्ता नमंसित्ता पसिणाई पुच्छइ पुच्छित्ता अट्ठाई परियाएइ परियाइना उट्ठाए उट्टेइ उद्वित्ता समर्ण भगवं महावीरं वंदइ नमसइ २ एवं बयासी-सुयक्वाए णं भंते ! निग्गंथे पावयणे जाब एरिसं धम्ममाइक्वित्तए, एवं वइत्ता हत्थिं दुरूहइ दुरूहित्ता समणस्स भगवतो| महावीरस्स अंतियानो अंबसालवणाओ चेहवाओ पडिनिकखाइ पडिनिक्वामित्ता जामेच दिसि पाउम्र तामेव दिसि पडिगते" हाइति, इर्द च प्रायः सकलमपि सुगमं नवरं यामेव दिशमवलन्य, किमुक्तं भवति ?-यतो दिशः सकाशात् प्रादुर्भूतः-समवसरणे : Santaratana Ema भगवत् महावीरस्य संमुख: सूर्याभदेव-कृत् नाट्यविधि-दर्शनं ~102
SR No.035015
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 15 Rajprashniya Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages314
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_rajprashniya
File Size68 MB
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