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________________ आगम भाग-१४ "विपाकश्रुत" - अंगसूत्र-११ (मूलं+वृत्तिः ) श्रुतस्कंध: [१], ----------------------- अध्य यनं [४] ----------- --------- मूलं [२३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[११], अंगसूत्र-[११] विपाकश्रुत' मूलं एवं अभयदेवसूरिरचिता वृत्ति: विपाकेकम्मे० सुबहुं पावकम्मं समजिणित्ता कालमासे कालं किचा इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए णेरइयत्ताए उव- ४ शकटा. श्रुत०१ वन्ने, संसारो तहेव जाव पुढवीए, से गं ततो अणंतरं उब्वहित्ता वाणारसीए नयरीए मच्छत्ताए उववजि-3 | भवान्त IIहिति, से णं तत्थ णं मच्छबंधिएहिं वहिए तत्व वाणारसीए नयरीए सेटिकुलसि पुत्तत्ताए पचायाहिति राणि "" बोहिं बज्मे० पब्व. सोहम्मे कप्पे महाविदेहे वासे सिजिझहिति निक्खेवो दुहविवागाणं चोत्थस्स सू०२० अज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते ॥ (मू०२३) चोत्थं अज्झयणं सम्मत्तं ॥ ४॥ प्रत सूत्रांक [२३] दीप अनुक्रम GRA (२६) -१'निक्खेवो'त्ति एवं खलु जंबू! समणेणं भगवया महावीरेणं चउत्थस्स अज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते' इत्येवंरूपं निगमनं वा- ध्यमिति । शेषमुपयुज्य प्रथमाध्ययनानुसारेण व्याख्येयमिति चतुर्थाध्ययनविवरणम् ॥ ४॥ ॥२७॥ अत्र मूल संपादने शीर्षक-स्थाने सूत्र-क्रमांकने एका स्खलना दृश्यते- यत् सू० २३ स्थाने सू० २० इति क्रम मुद्रितं अत्र चतुर्थ अध्ययनं परिसमाप्तं ~80
SR No.035014
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 14 Vipakshrut and Auppatik Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size81 MB
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