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________________ आगम (११) भाग-१४ "विपाकश्रुत" - अंगसूत्र-११ (मूलं+वृत्ति:) श्रुतस्कंध: [१], ---------------------- अध्ययन [४] ----------------------- मूलं [२३] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[११], अंगसूत्र-[११] विपाकश्रुत' मूलं एवं अभयदेवसूरिरचिता वृत्ति: प्रत वजिहिह, सगडे णं दारए गोयमा! सत्तावणं वासाइं परमाउयं पालइत्ता अब्रेव तिभागावसेसे दिवसे एगं महं अओमयं तत्तसमजोहभूयं इत्थिपडिम अवयासाविते समाणे कालमासे कालं किया इमीसे रयण पभाए पुढवीए णेरइयत्ताए उववजिहिति, सेणं ततो अणंतरं उच्चहित्ता रायगिहे गरे मातंगकुलंसि दजुगलत्ताए पचायाहिति, तते णं तस्स दारगस्स अम्मापियरो णिवत्तवारसगस्स इमं एपारूवं गोणं ना मधेनं करिस्संति, तं होऊ णं दारगं सगडे नामेणं होऊ णं दारिया सुदरिसणानामेणं, तते णं से सगडे दा रए उम्मुकवालभावे जोवण [गमणुपत्ते०] भविस्सइ, तए णं सा सुदरिसणावि दारिया उम्मुफयालभावा है(विषणय) जोब्बणगमणुप्पत्ता रूवेण य जोवण य लावणेण य उशिहा उकिट्टसरीरा यावि भविस्सह, तए णं से सगडे दारए सुदरिसणाए रूवेण य जोव्वणेण य लावणेण य मुच्छिए सुदरिसणाए सद्धिं उरा-18 लाई भोगभोगाई भुंजमाणे विहरिस्सति, तते णं से सगडे दारए अन्नया कयाई सयमेव कूडगाहित्तं उवसंपजिसाणं विहरिस्सति, तते णं से सगडे दारए कूडगाहे भविस्सइ अहम्मिए जाव दुष्पडियाणंदे एय-1 सूत्रांक [२३] दीप अनुक्रम ॐॐॐॐॐ १'अओमय' ति अयोमयी 'त' तप्ता, कथम् । इत्याह 'समजोहभूयंति समा-तुल्या ज्योतिषा-वहिना भूता या सा तथा| ताम् । 'अवयासाविए'त्ति अवयासितः-आलिङ्गितः। २ 'जोवण भविस्सइ'त्ति 'जोब्बणगमणुपत्ते अलं भोगसमत्थे यावि भविस्मति' इत्येवं द्रष्टव्यम् । ३'त सत्ति 'लए णं सा' इत्येवं दृश्यम् । “विनय'त्ति एतदेवं दृश्य-विण्णायपरिणयमेत्ता' । (२६) ~79~
SR No.035014
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 14 Vipakshrut and Auppatik Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size81 MB
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