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________________ आगम (१२) प्रत सूत्रांक [४३] दीप अनुक्रम [44] भाग-१४ “औपपातिक” - उपांगसूत्र - १ ( मूलं + वृत्ति:) मूलं [४३] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित... आगमसूत्र -[११], अंगसूत्र- [११] विपाकश्रुत" मूलं एवं अभयदेवसूरिरचिता वृत्तिः ज्जवसिया जाव चिर्हति । जीवा णं भंते! सिज्झमाणा कयरंमि संघयणे सिज्यंति ?, गोयमा ! वइरोसभणारायसंघयणे सिज्यंति, जीवा णं भंते! सिज्झमाणा कयरंमि संठाणे सिज्यंति ?, गोयमा ! छण्हं संठागाणं अण्णतरे संठाणे सिज्झति, जीवा णं भंते! सिज्झमाणा कयरम्मि उच्चन्ते सिज्झति ?, गोयमा ! जहपणेणं सत्तरयणीओ उक्कोसेणं पंचधणुस्सए सिज्यंति, जीवा णं भंते! सिज्झमाणा कयरम्मि आउए सिज्झति ?, गोयमा ! जहणेणं साइरेगडवासाउए उक्कोसेणं पुव्वकोडियाउए सिज्यंति । अस्थि णं भंते ! इमीसे रयणप्पहार पुढबीए अहे सिद्धा परिवति ?, जो इण्डे समडे, एवं जाव अहे सत्तमाए, अस्थि णं भंते ! सोहम्मस्स कप्पस्स अहे सिद्धा परिवसंति ?, णो इण्डे समट्टे, एवं सम्बेसिं पुच्छा, ईसाणस्स सणकुमारस्स जाव अच्यस्स गेविजविमाणाणं अणुत्तरविमाणाणं, अस्थि णं भंते ! ईसीप भाराए पुढवीए अहे सिद्धा | परिवसंति ?, णो इणडे समहे, से कहिं खाइ णं भंते । सिद्धा परिवसंति ?, गोयमा ! इमीसे रयणप्पहाए पुढ बीए बहुसमरमणिजाओ भूमिभागाओ उहुं चंदिमसूरियग्गह गणणक्खत्तताराभवणाओ बहू जोयणसयाई बहूई जोयणसहस्सा बहूई जोयणसय सहस्साई बहुओ जोयणकोडीओ बहूओ जोयणकोडाकोडीओ उद्दतरं उप्पइत्ता सोहम्मीसाणसणं कुमारमाहिंद बं भलंतगमहा सुक्कसहस्सार आणयपाणयआरणय तिष्णि य अ| हारे गेविजविमाणावाससए वीइवइत्ता विजयवेजयंत जयंत अपराजियसव्वहसिद्धस्स य महाविमाणस्स सच्च| उपरिल्लाओ धूभियग्गाओ दुवालसजोयणाई अवाहाए एत्थ णं ईसीफभारा णाम पुढची पण्णत्ता पण Ja Eucation internationa सिद्ध एवं सिद्धृपद प्राप्ति-विषयक : अधिकार: For Parts Only ~362~
SR No.035014
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 14 Vipakshrut and Auppatik Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size81 MB
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