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________________ आगम (११) भाग-१४ “विपाकश्रुत" - अंगसूत्र-११ (मूलं+वृत्ति:) श्रुतस्कंध: [१], ----------------------- अध्ययनं [१] ---------- ---------- मूलं [६] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[११], अंगसूत्र-[११] विपाकश्रुत" मूलं एवं अभयदेवसूरिरचिता वृत्ति: विपाके श्रुत०१ ॥४३॥ तिरसा मियादेवी एवं पयासी-देवाणुप्पिया! तुम्भं पढमं गन्भे तं जइ णं तुन्भे एवं एगते पकडिया१मृगापुट्राउझासि ततो णं तुम्भे पया नो थिरा भविस्सति, तो णं तुम एयं दारगं रहस्सिपगंसि भूमिघरंसि रह- त्रीयाध्य. भास्सिएणं भत्तपाणेर्ण पडिजागरमाणी २विहराहि तो गं तुभं पया घिरा भविस्सति, तते गं सा मियादेवी मृगापुत्रविजयस्स खत्तियस्स तहत्ति एपमहूँ विणएर्ण पडिमुणेति पडि २त्ता तं दारगं रहस्सियंसि भूमिधरंसि रह गत्यादि भत्सपाणणं पडिजागरमाणी विहरति, एवं खलु गोयमा! मियापुत्ते दारए पुरापुराणाणं जाव पच्चणुम्भव सू०७ माणे विहरति । (सू०६) मियापुत्ते णं भंते! दारए इओ कालमासे कालं किया कहिं गमहिति? कहिं उववजिहिति', गोषमा । मियापुत्ते दारए छब्बीसं वासाई परमाउयं पालइत्ता कालमासे कालं किचा इहेय जंबुद्दीचे दीवे भारहे वासे वेघडगिरिपायमूले सीहकुलंसि सीहत्ताए पञ्चायाहिति, से णं तत्थ सीहे भविस्ससि अहम्मिप जाव साहसिए मुबई पावं जाव समजिणति जाव समजिणित्ता कालमासे कालं किया है इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए कोससागरोवमठितीएमु जाव उचवजिहिति, से णं ततो अणंतरं उठब१ 'पुरा पोराणाणंति पुरा-पूर्वकाले कृतानामिति गम्यम् अत एव 'पुराणानां' चिरन्तनानाम् , इह च यावत्करणान् | ॥४ ॥ 'दुचिन्नार्ण दुष्पडिकंताण इत्यादि पावगं फलवित्तिविसेस'मित्यन्तं द्रष्टव्यम्। २'अहम्मिए' इत्यत्र यावत्करणाविदं दृश्य'बहुनगरनिग्गयजसे सूरे दृढप्पहारी ति, व्यकं च। ३ 'कालमासे'त्ति मरणावसरे । ४ 'सागरोवम जाव'त्ति 'सागरोपमहिईएसु नेरइयत्ताएं' द्रष्टव्यम् । JimEautatunintamaturnal maraonIALLPYRIGHTINCnty inwjaanemranorm मृगापुत्रस्य आगामि-भवा: ~32~
SR No.035014
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 14 Vipakshrut and Auppatik Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size81 MB
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