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________________ आगम (११) भाग-१४ “विपाकश्रुत" - अंगसूत्र-११ (मूलं+वृत्ति:) श्रुतस्कंध: [१], ----------------------- अध्ययनं [१] ---------- ---------- मूलं [६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[११], अंगसूत्र-[११]"विपाकश्रुत” मूलं एवं अभयदेवसूरिरचिता वृत्ति: पूर्वभवः विपाके पत्तेहि य पुष्फेहि य फलेहि य बीएहि प सिलियाहि य गुलियाहि य ओसहेहि य भेसजेहि य इच्छंति मृगापुश्रुत०१तेसिं सोलसह रोगायंकाणं एगमवि रोगायकं उवसमावितए, नो चेव णं संचाएंति उवसामित्सए। ततेत्रीयाध्य. ण ते बहवे विज्जा य विजपुत्ता य जाहे नो संचाएंति तेसिं सोलसहं रोगार्यकाणं एगमवि रोगायक उव- मृगापुत्र॥४१॥ सामित्तए ताहे संतों तंता परितंता जामेव विर्सि पाउन्भूया तामेव दिसि पडिगया, तते णं इकाईरहकूडे| विलोहिय पडियाइक्खिए परियारगपरिचसे निविण्णोसहभेसजे सोलसरोगायंकेहिं अभिभूए समाणे रज्जे या सू०५ रद्धेय जाव अंतेउरे य मुच्छिए रज्नं च रट्टं च आसाएमाणे पत्थेमाणे पीहेमाणे अभिलसमाणे अदुहवसट्टे अहाइजाई वाससयाई परमाउयं पालइत्ता कालमासे कालं किया इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए उको "सिलियाहि यति शिलिका:-किराततिक्तकप्रभृतिकाः 'गुलियाहि यत्ति द्रव्यवटिकाः 'ओसहेहि यत्ति औषधानिएकद्रव्यरूपाणि 'भेसजेहि य'ति भैषज्यानि-अनेकद्रव्ययोगरूपाणि पथ्यानि चेति । २'संत'ति भान्ता देशोदेन 'तेत'ति वान्ता मनासेदेन 'परितंत'त्ति उभयखेदेनेति 'रज्जे य रढे य' इत्यत्र यावत्करणादिदं दृश्य-कोसे व कोडागारे यवाहणे य'ति, 'मुच्छिए गढिए गिद्धे अझोववण्णे'त्ति एकार्थाः, 'आसाएमाणे त्यादय एकार्थाः, 'अदृदुहवसट्टे'त्ति आचों मनसा दुःखितो-दुःखातों देहेन वशास्तु-इन्द्रियवशेन पीडितः, ततः कर्मधारयः, 'उज्जला' इह यावत्करणादिदं दृश्य-विउला कक्कसा पगाढा चेडा दुहा X ॥४१॥ दातिव्या दुरहियास'त्ति एकार्थी एव, 'अणिट्ठा अकंता अप्पिया अमणुना अमणामा' एतेऽपि तथैव । CREASSAGAR -- FORTranwerwarrow wataneioraryam ~28~
SR No.035014
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 14 Vipakshrut and Auppatik Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size81 MB
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