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________________ आगम (१२) भाग-१४ “औपपातिक" - उपांगसूत्र-१ (मूलं+वृत्ति:) ------------- मूलं [११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[११], अंगसूत्र-[११विपाकश्रुत” मूलं एवं अभयदेवसूरिरचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक MI तए णं से पवित्तिवाजए इमीसे कहाए लखट्टे समाणे हहतुडचित्तमाणदिए पीइमणे परमसोमणस्सिए हरिसवसविसप्पमाणहियए पहाए कयबलिकम्मे कयकोउअमंगलपायच्छित्ते सुहप्पवेसाई मंगलाई वत्थाई पचरपरिहिए अप्पमहग्याभरणालंकियसरीरे सआओ गिहाओ पडिणिक्खमइ, सआओ गिहाओ पडिहै णिक्खमित्ता चपाए गयरीए मजझमझेणं जेणेव कोणियस्स रपणो गिहे जेणेव बाहिरिया उबट्ठाणसाला 8 Pilजेणेव कृणिए राया भंभसारपुत्ते तेणेव उवागछई २ करयलपरिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कह । जएणं विजएणं बद्धावेइ २ एवं वयासी-जस्स णं देवाणुपिया दंसणं कंखंति जस्स ां देवाणुप्पिया दंसर्ण है पीहंति जस्स णं देवाणुप्पिया सणं पत्थंति जस्स देवाणुप्पिया दसणं अभिलसंति जस्स णं देवा गुप्पिया णामगोत्तस्सवि सवणयाए हहतुट्ठजावहिअया भवंति, से णं समणे भगवं महावीरे पुन्वाणुपुचि चरमाणे गामाणुग्गामं दूइजमाणे चंपाए णयरीए उवणगरगाम उवागए चंप णगरि पुण्णभदं चेइ समोसरि कामे, तं एअ णं देवाणुप्पियाणं पिअट्ठयाए पिअंणिवेदेमि, पिअंते भवज ॥ (सू०११)॥ ततोऽनन्तरं, 'ण'मिति वाक्यालङ्कारे, 'से' इति असौ 'पवित्तिवाउए'त्ति प्रवृत्तिव्यावृतो भगवद्वाच्यापारवान् 'इमीसे कहाएत्ति अस्यां भगवदागमनलक्षणायां वार्तायां 'लद्धहे समाणे'त्ति लब्धार्थः सन्-प्राप्तार्थः सन् , विज्ञः सन्नित्यर्थः, 'हड्तुद्दचित्तमाणदिए'त्ति हृष्टतुष्टम्-अत्यर्थतुष्टं हृष्टं वा-विस्मितं तुष्टं च-तोषवचित्त-मनो यत्र तत्तथा तत् हटतुष्टचित्तं १ क्रियापदस्याये द्विकलक्षणाङ्केन तस्यैव पूर्वकालकृदन्तता ज्ञेयेति लिखनशैली, कचित्तु अमे 'सा' इति लिखनमपि, दीप अनुक्रम ११) ~184~
SR No.035014
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 14 Vipakshrut and Auppatik Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size81 MB
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