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________________ आगम (१२) भाग-१४ “औपपातिक" - उपांगसूत्र-१ (मूलं+वृत्ति:) ------------ मूलं [...१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[११], अंगसूत्र-[११विपाकश्रुत” मूलं एवं अभयदेवसूरिरचिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [१०] क्ष्यमाणदन्तविभागत्वात् अनेके दन्ता यस्य स तथा । 'हुयवहणितधोयतत्ततवणि जरत्ततलतालुजीहे' हुतवहेन-अग्निना & निर्मात-दग्धमलं धौत-जलप्रक्षालितं तप्त-सतापं यत्तपनीयं-सुवर्ण तद्वद्रततलं-लोहितरूपं तालु च-काकुदं जिह्वा | च-रसना यस्य स तथा। अवडियसुविभत्तचित्तमंसू मंसलसंठियपसस्थसहूलविउलहणूए चउरंगुलमुप्पमाणकंबुवरसरिसग्गीवे वर-18 महिसवराहसीहसलउसभनागवरपडिपुषणविउलक्खंधे जुगसन्निभपीणरइयपीवरपउहसुसंठियमुसिलिदृविसिषणथिरसुबहसंधिपुरवरफलिहवहियभुए भुअईसरविउलभोगआदाणपलिहउच्छूढदीहबार रत्तत-19 लोवइयमउअमंसलसुजायलक्खणपसत्थअच्छिद्दजालपाणी पीवरकोमलवरंगुली आयंचतंवतलिणसुहरुइल&ाणिदणक्खे चंदपाणिलेहे सूरपाणिलेहे संखपाणिलेहे चक्रपाणिलेहे दिसासोत्थिअपाणिलेहे चंदसरसंखचकट दिसासोस्थिअपाणिलेहे कणगसिलातलुज्जलपसत्थसमतलवचियविच्छिण्णपिठुलवच्छे सिरिवच्छंकियवच्छे अकरंडुअकणगरुयपनिम्मलसुजायनिरुवहयदेहधारी अट्ठसहस्सपडिपुण्णवरपुरिसलक्खणधरे सपणय-18 पासे संगपपासे सुंदरपासे सुजायपासे मियमाइअपीणरइअपासे उज्जुअसमसहियजचतणुकसिणणिद्धआइ जलडहरमणिजरोमराई झसविहगसुजायपीणकुच्छी BI 'अवडियसुविभत्तचित्तमंसू' अवस्थितानि-अवद्धिष्णूनि सुविभक्कानि-विविक्तानि चित्राणि-अतिरम्यतया अङ्गतानि || श्मश्रूणि-कूर्चकेशा यस्य स तथा । 'मसलसंठियपसत्थसहलविउलहणूए' मांसल-उपचितमांसः संस्थितो-विशिष्टसंस्थानः दीप अनुक्रम [१०] भगवंत-महावीरस्य परिचय: ~174
SR No.035014
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 14 Vipakshrut and Auppatik Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size81 MB
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