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________________ आगम (११) प्रत सूत्रांक [३४] दीप अनुक्रम [३८-४७] भाग 14 भाग-१४ “विपाकश्रुत” - अंगसूत्र - ११ ( मूलं + वृत्ति:) अध्ययनं [२-१०] मूलं [३४] श्रुतस्कंध [२], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र -[११], अंगसूत्र -[११] विपाकश्रुत" मूलं एवं अभयदेवसूरिरचिता वृत्तिः Education दुहविवागे दस अज्झयणा एकसरगा दससु चेष दिवसेसु उद्दिसिज्जंति, एवं सुहविवागोवि, सेसं जहा आयारस्स || इति एकारसमं अंगं सम्मत्तं ॥ ११ ॥ ग्रन्थानं १२५० ॥ १ एवमुत्तराणि नवाप्यनुगन्तव्यानीति ॥ समाप्तं विपाकश्रुताख्यैकादशाङ्गप्रदेशविवरणं ॥ इहानुयोगे यवयुक्तमुक्तं, तद्धीधना द्राक् परिशोधयन्तु। नोपेक्षणं युतिमदत्र येन, जिनागमे भक्तिपरायणानाम् ॥ १ ॥ कृतिरियं संविप्रमुनिजनप्रधान श्रीजिनेश्वराचार्यचरणकमलच भ्वरीककल्पस्य श्रीमदभयदेवाचार्यस्येति ॥ प्रन्थानं ९०० ॥ श्रीरस्तु ॥ ॥ इति श्रीमदभयदेवाचार्यविहितविवरणयुता विपाकदशा गताः समाप्तिम् ॥ Fr Persoal & Private Use O विपाकश्रुत-अंगसूत्र- [११] मूलं एवं अभयदेवसूरिजी रचिता टीका परिसमाप्ताः मूल संशोधकः सम्पादकश्च पूज्य आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराज साहे किंचित् वैशिष्ट्य समर्पितेन सह पुनः संकलनकर्ता मुनि दीपरत्नसागरजी (M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि] ~ 137 ~
SR No.035014
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 14 Vipakshrut and Auppatik Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages384
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size81 MB
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