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________________ आगम (०६) [भाग-१२] “ज्ञाताधर्मकथा" - अंगसूत्र-६ (मूलं+वृत्ति:) श्रुतस्कन्ध: [१] ----------------- अध्ययनं [११], ----------- ------ मूलं [१०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[०६] अंगसूत्र-[०६] "ज्ञाताधर्मकथा" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति: एकादशज्ञातविवरणम् । ज्ञाताधर्मकथाङ्गम्. प्रत सत्राक ॥१७१॥ [९०] दीप अनुक्रम [१४२] cerserseleoenesepeper ११दावद्रवज्ञाताध्य. स्वपरोभयानुभयोक्तिसहने देशविराधनाराधनसाराधनविराधनाः सू.९० ॥१७॥ अथैकादशमं विवियते-अस्य पूर्वेण सहायं सम्बन्धः-पूर्वत्र च प्रमाधप्रमादिनोर्गुणहानिवृद्धिलक्षणावनार्थायुक्ती, इह तु मार्गाराधनविराधनाभ्यां तावुच्यते इतिसम्बमिदम् जति णं भंते ! दसमस्स नायजसणस्स अयमढे एकारसमस के अ०१. एवं खल जव! तेणं कालेणं २ रायगिहे गोयमे एवं वदासी-कह णं भंते ! जीवा आराहगा वा विराहगा वा भवंति ?, गो! से जहा णामए एगंसि समुद्दकूलंसि दावद्दवा नाम रुक्खा पपणत्ता किण्हा जाव निउबभूया पत्तिया पुफिया फलिया हरियगरेरिजमाणा सिरीए अतीव उवसोभेमाणा २ चिट्ठति, जया णं दीविचगा इंसिं पुरेवाया पच्छावाया मंदावाया महावाया वायंति तदा णं बहवे दावद्दया रुक्खा पत्तिया जाव चिट्ठति अप्पेगतिया दाबद्दवा रुक्खा जुन्ना झोडा परिसडियपंडुपत्तपुष्फफला सुक्रुक्खओ विव मिलायमाणा २ चिट्ठति, एवामेव समणाउसो! जे अम्हं निग्गंथो वा निग्गंथी वा जाव पञ्चतिते समाणे बट्टणं समणाणं ४ सम्म सहति जाव अहियासेति बरणं अपणउत्थियाणं वहणं गिहत्थाणं नो सम्मं सहति जाब नो अहियासेति एस णं मए पुरिसे देसविराहए पण्णत्ते समणाउसो! जया णं सामुदगा इंसिं पुरेवाया पच्छा SAREauratonintimational अथ अध्ययन- ११ "दावद्रव" आरभ्यते ~352
SR No.035012
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 12 Gyatadharmkatha Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages522
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_gyatadharmkatha
File Size113 MB
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