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आगम (०५)
[भाग-१०] "भगवती"-अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:)
शतक [१५], वर्ग -1, अंतर्-शतक [-], उद्देशक [-], मूलं [५६०] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [०५, अंगसूत्र- [०५] "भगवती" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचिता वृत्ति:
प्रत सूत्रांक [१६०]
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व्याख्या-1 अग्गिकुमारे देवेसु देवत्ताए उववजिहिति, से णं ततोहितो अणंतरं उच्चट्टित्ता माणुस्सं विग्गरं लभिहिति ॥ १५ गोशाप्रज्ञप्ति माणुस्सं २ केवलं बोहिं बुझिहिति के०२ मुंडे भवित्ता आगाराओ अणगारियं पचहिति, तत्वविय णं| लकशत अभयदेवी-विराहियसामन्ने कालमासे कालं किचा दाहिणिल्लेसु असुरकुमारेसुदेवेसु देवत्ताए उववजिहिति, से णं तओ-2 दारिकासया वृत्तिः हिंतो जाव उच्चहित्ता माणुसं विग्गहं तं चेव जाच तत्थवि णं विराहियसामने कालमासे जाव किचा दाहि- म्यक्त्वचर॥६९४॥ || णिल्लेसु नागकुमारेसु देवेसु देवत्ताए उववजिहिति, से णं तओहिंतो अणंतरं एवं एएणं अभिलावेणं दाहि-पाणयुताम दिणिल्लेसु सुवन्नकुमारेसु एवं विजुकुमारेसु एवं अग्गिकुमारवजं जाव दाहिणिल्लेसु थणियकुमारसु से तओह
भवश्च जाव उच्चट्टित्तामाणुस्सं विग्गहं लभिहिति जाब विराहियसामने जोइसिएम देवेसु उववजिहिति, से णं तओ | सूप.
अणंतरं चयं चइत्ता माणुस्सं विग्ग लभिहिति जाव अविराहियसामन्ने कालमासे कालं किचा सोहम्मे कप्पे || देवत्ताए उववजिहिति, से णं तओहिंतो अर्णतरं चयं चइत्ता माणुस्सं विग्गहं लभिहिति केवलं बोर्हि बु-II झिहिति, तत्थवि णं अविराहियसामन्ने कालमासे कालं किच्चा ईसाणे कप्पे देवत्ताए उववजिहिति, सेणं तओ चहत्ता माणुस्सं विग्गहं लभिहिति, तत्थवि णं अविराहियसामन्ने कालमासे कालं किचा सणंकुमारे कप्पे देवत्ताए उववजिहिति, से णं तओहिंतो एवं जहा सणकुमारे तहा बंभलोए महासुके आणए आरणे, ९॥ से णं तओ जाव अविराहियसामने कालमासे कालं किया सबसिद्धे महाविमाणे देवत्ताए उववजिहिति, से णं तओहितो अणंतरं चयं चइत्ता महाविदेहे वासे जाई इमाई कुलाई भवंति-अहाई जाव अपरिभूयाई,
दीप अनुक्रम [६५९]
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गोशालक-चरित्रं
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