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________________ आगम (०३) [भाग-5] “स्थान" - अंगसूत्र-३ (मूलं+वृत्ति:) स्थान [४], उद्देशक [२], मूलं [२८२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित....आगमसूत्र - [०३], अंग सूत्र - [३] "स्थान" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचित वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२८२] &ालीस्तम्भसमानमित्यादिरूपा, एवं परलोकसंवेदनी देवादिभवस्वभावकथनरूपा-देवा अपीयाविषादभयवियोगादिदुःखैमारभिभूताः, किं पुनतिर्थगादय इति, आत्मशरीरसंवेगनी यदेतदस्मदीयं शरीरमेतदशुचि अशुचिकारणजातमशुचिद्वार| विनिर्गतमिति न प्रतिबन्धस्थानमित्यादिकथनरूपा, एवं परशरीरसंवेगनी, अथवा परशरीरं-मृतकशरीरमिति, इहलोके दक्षीर्णानि-चौर्यादीनि कर्माणि-क्रिया इहलोके दुःखमेव कर्मदुमजन्यत्वात् फलं दुःखफलं तस्य विपाक:-अनु-18 भवो दुःखफलविपाकस्तेन संयुक्तानि दुःखफलविपाकसंयुक्तानि भवन्ति चौरादीनामिवेत्येका, एवं नारकाणामिवेति द्वितीया, आ गर्भात् व्याधिदारिद्याभिभूतानामिवेति तृतीया, प्राक्कृताशुभकर्मोत्पन्नानां नरकप्रायोग्य बनता काकगृध्रादीनामिव चतुर्थीति, 'इहलोए सुचिन्नेत्यादि चतुर्भङ्गी तीर्थकरदानदातृ १ सुसाधु २ तीर्थकर ३ देवभवस्थतीथकरादीना ४ मिव भावनीयेति ॥ उक्तो वाग्विशेषोऽधुना पुरुषजातप्रधानतया कायविशेषमाह• तहेब बचारि पुरिसजाया पं० त०-किसे णाममेगे किसे किसे णाममेगे दृढे दढे णाममेगे किसे बढे णाममेगे दढे, चत्तारि पुरिसजाया पं० ०-किसे णाममेगे किससरीरे किसे णाममेगे दुढसरीरे दढे णाममेगे किससरीरे दढे णाममेगे दढसरीरे ४ ॥ चत्तारि पुरिसजाया पं० त०-किससरीरस्स नाममेगस्स णाणदसणे समुप्पचति णो दढसरीरस्स दढसरीरस्स णाम एगस्स णाणदसणे समुप्पज्जति णो किससरीरस्स एगस्स किससरीरस्सवि णाणदसणे समुपज्जति दढसरीरस्सवि एगस्स नो किससरीरस्स गाणदंसणे समुप्पजति णो दडसरीरस्स (सू० २८३) चउहि ठाणेहिं निगंधाण वा निग्गंधीण वा अस्सि समयंसि अतिसेसे नाणसणे समुपजिसकामेवि न समुप्पोजा, तं० दीप अनुक्रम [३०१] ॐॐERESH 'विकथा' सम्बन्धी दीर्घचर्चा ~433~
SR No.035005
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 05 Sthan Mool evam Vrutti Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages594
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sthanang
File Size123 MB
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