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________________ आगम (०३) [भाग-5] "स्थान" - अंगसूत्र-३ (मूलं+वृत्ति:) स्थान [४], उद्देशक [१], मूलं [२४८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित....आगमसूत्र - [०३], अंग सूत्र - [३] "स्थान" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचित वृत्ति: प्रत सूत्रांक [२४८] दीप चलठियहा देवाण ठिती पं० सं०-देवे णाममेगे १ देवसिणाते नाममेगे २ देवपुरोहिते नाममेगे ३ देवपज्जलणे नाममेगे ४, चउम्विधे संवासे पं० त०-देचे णाममेगे देवीए सद्धिं संवासं गच्छेज्जा, देवे णाममेगे छवीते सहि संवासं गच्छेला, छवी णाममेगे देवीए सहिं संवासं गच्छेजा, छवी णाममेगे छवीते सद्धिं संवासं गकछेजा (सू० २४८) पत्तारि कसाया पं० २०-कोहकसाए माणकसाए मायाकसाए लोभकसाए, एवं रझ्याण जाव वेमाणियाणं २४, चउपतिद्विते कोहे पं००-आतपइद्विते परपतिटिए तदुभयपइढ़िते अपतिहिए, एवं रइयाणं जाप माणियाण २४, एवं जाच लोभे, माणियाण २४, चउहि ठाणेहिं कोधुष्पत्ती सिता, तं०-खेत्तं पबुचा बरथु पहुचा सरीर पडुच्चा उवहिं पडचा, एवं रझ्याणं जाव बेमाणियाणं २४, एवं जाव लोभ० वेमाणियाणं २४, चतबिधे कोहे पं० २०अर्णताणुबंधिकोहे अपचक्खाणकोहे पञ्चक्खाणावरणे कोहे संजलणे कोहे, एवं नेरइयाणं जाव बेमाणियाण २४, एवं जाव लोभे वैमाणियाण २४, चउबिहे कोहे पं० त०-आभोगणिन्वत्तिए अणाभोगणिन्वत्तिते जबसते अणुवसंते, एवं नेरदयार्ण जाव धेमाणियाणं २४, एवं जाव लोभे जाव वेमाणियाणं २४ (सू० २४९) स्थिति:-क्रमो मर्यादा राजामात्यादिमनुष्यस्थितिवदेव, देवः सामान्यो नामेति वाक्यालङ्कारे एकः कश्चित् स्नातकःप्रधानः, देव एव देवानां वा स्नातक इति विग्रहः, एवमुत्तरत्रापि, नवरं पुरोहितः-शान्तिकर्मकारी 'पज्जलणे'त्ति प्रज्वलयति-दीपयति वर्णवादकरणेन मागधवदिति प्रज्वलन इति । देवस्थितिप्रस्तावात् तद्विशेषभूतसंवाससूत्रम् , ए-1 सातच व्यकं, किन्तु संवासो-मैथुनार्थ संवसनं, 'छवि'त्ति त्वक्तद्योगादौदारिकशरीरं तद्वती नारी तिरश्ची वा तद्वान्नर अनुक्रम [२६२] wwwjangalmayo ~ 395
SR No.035005
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 05 Sthan Mool evam Vrutti Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages594
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sthanang
File Size123 MB
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