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________________ आगम (०३) [भाग-5] "स्थान" - अंगसूत्र-३ (मूलं+वृत्ति:) स्थान [३], उद्देशक [१], मूलं [१३५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित....आगमसूत्र - [०३), अंग सूत्र - [०३] "स्थान" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचित वृत्ति: प्रत सूत्रांक [१३५] दीप अनुक्रम [१४३] ॐॐॐॐ भवति कृतोपकारो, यदाह-"जो जेण जंमि ठाणम्मि ठाविओ दंसणे व चरणे था। सो तं तओ चुर्य तंमि चेव का भवे निरिणो ॥१॥" त्ति, शेष सुगमरवान्न स्पृष्टमिति । धर्मस्थापनेन चास्य भवच्छेदलक्षणः प्रत्युपकारः कृतः स्यादिति | धर्मस्य स्थानत्रयावतारणेन भवच्छेदकारणतामाह तिहिं ठाणेहिं संपण्णे अणगारे अणादीय अणवदरगं दीहमळू चाउरतं संसारकतारं वीईवएज्जा, तं०-अणिदाणयाए दिहिसंपन्नयाए जोगवाहियाए (सू० १३६) तिविहा ओसप्पिणी पं० २०-उकोसा मज्झिमा जहन्ना १, एवं छप्पि समाओ भाणियन्याओ, जाय दूसमदूसमा ७, तिविहा उस्सप्पिणी पं० त०-ओसा मज्झिमा जहन्ना ८ एवं छप्पि समाओ भाणियब्बाओ, जाव मुसगसुसमा १४ (सू० १३७) तिहिं ठाणेहिं अच्छिन्ने पोमाले चलेजातं.--आहारिजमाणे वा पोमाले चलेजा विकुब्वमाणे वा पोग्गले चलेना ठाणातो वा ठाणं संकामिजमाणे पोग्गले चलेजा, तिविहे उषधी पं० तं०-कम्मोवही सरीरोवही बाहिरभंतमत्तोवही, एवं असुरकुमाराणं भाणियन्वं, एवं एगिदियनेरहयवज जाव वेमाणियाणं १, महवा तिविहे उवधी पं० सं०-सचित्ते अचित्ते मीसए, एवं रहाणं निरंतर आव वेमाणियाणं, तिविहे परिग्गहे पं० २०-कम्मपरिगहे सरीरपरिग्गहे बाहिरभंडमतपरिग्गहे, एवं असुरकुमाराणं, एवं एगिदियनेरतियवजं आव वेमाणियाणं ३, अहवा तिविहे परिगहे प० त०-सचिसे अचित्ते मीसए, एवं नेरतियाणं निरंतरं जाव वेमाणियाणं ४ (सू०॥ १३८॥) यो येन यस्मिन् स्थाने स्थापितो दर्शने या वरणे वा । स तं ततश्रुतं तसिप कृत्वा भवेशिर्षणः॥१॥ REucatunintimational ~249~
SR No.035005
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 05 Sthan Mool evam Vrutti Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages594
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sthanang
File Size123 MB
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