SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 154
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम (०३) [भाग-5] "स्थान" - अंगसूत्र-३ (मूलं+वृत्ति:) स्थान [२], उद्देशक [३], मूलं [८८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित....आगमसूत्र - [०३], अंग सूत्र - [०३] "स्थान" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचित वृत्ति: प्रत सूत्रांक श्रीस्थाना सूत्रवृत्तिः २ स्थानकाध्ययने उद्देशः३ दादिस्व० ॥७२॥ दीप जंबूमंदर० उत्तरदाहिणेणं चुलहिमवंतसिहरीसु वासहरपव्वयेसु दो महदहा पं० २०-बहुसमतुल्ला अविसेसमणाणत्ता अण्णमण्णं णातिवदृति, आयामविक्खंभउब्वेहसंठाणपरिणाहेणं, ३०-पउमदहे चेव पुंडरीयदहे चेव, तस्थ णं दो देवयाओ महड़ियाओ जाव पलिओवमद्वितीयाओ परिवसति, सं०-सिरी चेव लच्छी घेव, एवं महाहिमवंतरुप्पीमु वासहरपन्नएसु दो महदहा पं० २०-बहुसम० जाव तं -महापउमरहे चेव महापौडरीयरहे चेव, देवताओ हिरिशेव बुद्विमेव, एवं निसढनीलवंतेमु तिगिछिदहे चेव केसरिबहे चेव, देवताओ धिती चेव कित्तिवेव, जंबूमंदर दाहिणेणं महाहिमवंताओ वासहरपब्ववाओ महापउमदहाओ दहाओ दो महाणईओ पवहंति, तं०-रोहियचेव हरिकंतव, एवं निसढाओ वासहरसवताओ तिगिछिदहाओ दो म० त०-इरिव सीओअश्व, जंघूमंदर० उत्तरेणं भीलवंताओ वासहरपब्वताओ केसरिदहाभो दो महानईओ पवहंति, तं०-सीता चेव नारिकता चेब, एवं रुप्पीओ वासहरपव्वताओ महापोंडरीयदहाओ दो महानईओ पवहं ति, तं०-णरकता चेव रुप्पकूला चेव, जंबूमंदरदाहिणेणं भरहे वासे दो पवायदहा पं० सं०- बहुसम० सं०-गप्पवातदहे चेव सिंधुप्पवायदहे चेव । एवं हिमवए वासे दो पवायदहा पं० २० -बहु० सं०-रोहियप्पवातहहे चेव रोहियंसपवातहहे चेव, जंबूमंदरदाहिणेणं हरिवासे वासे दो पवायदहा पं० बहुसम० त०-हरिपवातद्दहे चेव हरिकंतपवातहहे चेव, जंवूमंदरउत्तरदाहिणणं भहाविदेहवासे दो पवायहहा ५० बहुसम० जाव सीअपवातहदे चेव सीतोदष्पवायदहे चेव, जंबूर्मदरस्स उत्तरेणं रम्मए वासे दो पवायदहा पं०२०-बहु० जाब नरकंतपवायदहे जेवणारीकतप्पवायदहे चेव, एवं हेरन्नवते वासे दो पवायदहा पं० सं०-..-बहु० सुवन्नकूलप्पवायदहे अनुक्रम [८८ ॥७२॥ ~154~
SR No.035005
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 05 Sthan Mool evam Vrutti Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages594
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sthanang
File Size123 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy