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________________ आगम (०१) प्रत सूत्रांक [ १७९] टीप अनुक्रम [973... ५४०] [भाग 2] “आचारमूलं ” – अंगसूत्र - १ (मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) श्रुतस्कंध [२. ], चुडा [३], अध्ययन [-] उद्देशक [-] मूलं [१७९] निर्मुक्तिः [ ३४१] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधित मुनि दीपरत्नसागरेण पुनः संकलित.. आगमसूत्र [०१], अंग सूत्र [०१] "आचार" "मूलं एवं शिलांकाचार्य-कृत् वृत्तिः श्रीआचाराङ्गवृत्तिः (शी०) ॥ ४२७ ॥ Education Internationa सभोवणभोई से निमांथे, केवली थूया -- अइमत्तपाणभोयणभोई से निमथे पणियरसभोयणभोई संतिभेया जाव भंसिना, नाझ्मत्तपाणभोयणभोई से निग्गंथे तो पणीयरसभोवणभोइत्ति चउत्था भावणा । अहावरा पंचमा भावणा-नो निगांथे इत्थीपसुपंडगसंसत्ताई सयणासणाई सेवित्तए सिया, केवली बूया निमथे णं इत्थीपसुपंडगसंसत्ताई सयणासणाई सेवेमाणे संविभेया जाब सिना, नो निग्गंथे इत्थीपसुपंडगसंसत्ताई सयणासणाई सेवित्तए सियत्ति पंचमा भावणा ५, एतावया च महत्वए सम्मं कारण फासेइ जाव आराहिए यावि भवइ, वत्थं भंते! महस्वयं । अहावरं पंचमं भंते! महत्वयं सव्वं परिग्गदं पचक्खामि से अप्पं वा बहुं वा अणुं वा धूलं वा चित्तमंतमचित्तं वा नेव सयं परिग गिव्हिजा नेवन्नेहिं परिग्गहं गिन्हाविजा अनंपि परममहं गिण्हतं न समणुजाणिज्जा जाव वोसिरामि, तस्सिमाओ पंच भावणाओ भवति, तत्थिमा पढमा भावणा-सोयओ णं जीवे [मणुन्ना ] मणुन्नाई सदाई सुणेइ मणुनामणुन्नेहिं सहेहिं नो सजिजा नो रजिजा नो गोजा नो मुज्झि (च्छे )जा नो अज्झोववजिला नो विणिधाय मावा, केवली 'बूया निग्गंथे णं मणुनामणुन्नेहिं सद्देहिं सज्जमाणे रज्ञमाणे जाव विणिघायगावज्रमाणे संतिभेवा संतिविभंगा संतिकेवलिपन्नत्ताओ धम्माओ भंसिना, न सका न सोड सद्दा, सोतविसयमागया । रागदोसा उ जे तत्थ, ते भिक्खू परिवज्जए ॥ १ ॥ सोयओ जीवे मणुनामणुन्नाई सद्दाई सुणेइ पढमा भावणा १। अहावरा दुवा भावणा- चक्लूओ जीवो मणुन्नामणुन्नाई रुवाई पासइ मणुन्नामणुन्नेहिं रूवेहिं सजमाणे जाव विणिघायगावज्रमाणे संतिभेया जाव भंसिजा, नसका रुवनद, चक्लुविसयमागयं । रागदोसा उ जे तत्य, ते भिक्खु परिवज्जए ॥ १ ॥ चक्खूओ जीवो मणुन्ना २ रुवाई पासइ, दुवा भावणा । For Panal Lise Only ~569~ श्रुतस्कं० २ चूलिका ३ भावनाध्य. ।। ४२७ ।। ar
SR No.035002
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 02 Aachaar Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages586
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_acharang
File Size117 MB
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