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________________ आगम (०१) [भाग-2] “आचार"मूलं "-अंगसूत्र-१ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) श्रुतस्कंध [२.], चुडा [१], अध्ययन [२], उद्देशक [३], मूलं [१०८], नियुक्ति: [३०४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित मुनि दीपरत्नसागरेण पुन: संकलित..आगमसूत्र-[१], अंग सूत्र-[१] “आचार" "मूलं एवं शिलांकाचार्य-कृत् वृत्ति: प्रत सूत्रांक [१०८] दीप अनुक्रम [४४२] से मिक्ख वा बहुसंधरिता अभिकंखिजा बहुफासुए सिज्जासंधारए दुरुहितए । से भिक्खू० बहु० दुरूहमाणे पुवामेव ससीसोबरियं कार्य पाए य पमजिय २ तओ संजयामेव बहु० दुरुहिता तओ संजयामेव बहु० सइज्जा ।। (सू०१०८) से इत्यादि स्पष्टम् । इदानीं सुप्तविधिमधिकृत्याहसे निक्लू वा० बहु० सयमाणे नो अन्नमन्नस्स हत्येण हत्थं पाएण पार्य-कारण कार्य आसाइजा, से अणासायमाणे तओ संजयामेव बहु० सइना ।। से भिक्खू वा उस्सासमाणे बा नीसासमाणे वा कासमाणे वा छीयमाणे वा जंभायमाणे वा उड्डोए वा वायनिसर्ग वा करेमाणे पुवामेव आसयं वा पोसयं वा पाणिणा परिपेहिता तओ संजयामेव ऊससिज्जा वा जाव वायनिसर्ग वा करेज्जा ।। (सू० १०९) निगदसिद्धम् , इयमत्र भावना-स्वपद्भिहस्तमात्रव्यवहितसंस्तारकैः स्वप्तव्यमिति ॥ एवं सुप्तस्य निःश्वसितादिविधिसूत्रमुत्तानार्थं, नवरम् 'आसयं वत्ति आस्य 'पोसयं वा' इत्यधिष्ठानमिति ।। साम्प्रतं सामान्येन शय्यामङ्गीकृत्याह से भिक्खू वा० समा वेगया सिजा भविजा विसमा वेगया सि० पबाया वे० निवाया वे० ससरक्खा वे० अप्पससरक्खा वे० सदसमसगा वेगया अपदसमसगा० सपरिसाडा वे० अपरिसाडा. सउबसग्गा वे० निरुवसग्गा वे० तहप्पगाराहि सिलाहिं संविजमाणाहिं पगहियतरागं विहार विहरिजा नो किंचिबि गिलाइजा, एवं खलुजं सबढेहिं सहिए सया जएत्तिबेमि (सू०११०)२-१-२-२ ।। अत्र यत् २-१-२-२ लिखितं, तत् मुद्रण दोषः। (यहाँ २/९/२/३ होना चाहिए, क्योंकि दूसरे श्रुतस्कंध की पहेली चुडा के दूसरे अध्ययन का ये तीसरा उद्देशक समाप्त हुआ है। ~462~
SR No.035002
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 02 Aachaar Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages586
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_acharang
File Size117 MB
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