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________________ मेवाड़ की जैन पंचतीर्थी ६७ पकड़ न ले जायँ । दयालशाह की लड़की को मुसलमान लोग उठा ले गये थे । दयालशाह के जीवन सम्बन्धी उपर्युक्त वर्णन श्रीमान पं. गौरीशंकरजी ओझा ने अपने 'राजपूताने के इतिहास में अंकित किया है । जिन ओसवालकुलभूषण दयालशाह ने उपर्युक्त प्रकार के वीरता पूर्ण कार्य किये थे, उन्ही दयालशाह ने एक करोड रुपया खर्च करके नौमंजीला गगन स्पर्शी मन्दिर बनवाया था; जो काँकरोली तथा राजनगर के बीच राजसागर की पाल के पास ही एक पहाड़ पर सुशोभित है और आज भी ' दयालशाह के किले ' के नाम से प्रसिद्ध है और मूल नायक चौमुखजी श्री ऋषभदेव भगवान् की मूर्तियाँ विराजमान हैं । • कहा जाता है कि यह मन्दिर नौमंजीला था । इसके ध्वज की छाया छः कोस (बारह माइल) पर पड़ती थी । आगे चल कर, औरंगजेब ने उसे राजशाही किला समझ कर तुड़वा डाला था । मन्दिर की पहली मंजिल सुरक्षित बच गईं थी । इस समय जो दूसरी मंजिल है, वह नई बनी हुई है । · • इस मन्दिर के सम्बन्ध में कहा जाता है कि महाराणा राजसिंह ने राजसागर की पाल बनवाना प्रारम्भ किया, किन्तु वह टिकती नहीं थी । अन्तमें 'किसी सच्ची-सती स्त्री के हाथ से यदि पाल की नींव डाली जाय, तो पाल का काम चल सके ' ऐसी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034962
Book TitleMeri Mewad Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherVijaydharmsuri Jain Granthmala
Publication Year1936
Total Pages124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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