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________________ ४० उसका अपभ्रंस है । विजयप्रशस्ति महाकाव्य के प्रथम सर्ग में लिखा है कि नारदमुनिने मेवाड़देश के विशाल भूमि-पट को देख कर वहाँ अपने नाम से ' नारदपुरी ' नामक नगरी बसाई और वह उसी नाम से सर्वत्र प्रख्यात हुई । उसमें श्रीकृष्णजी के पुत्र प्रद्युम्नकुमारने समीपवर्त्ती पर्वत के ऊपर उत्तुंग सशिखरी जिनालय बनवा कर उसमें श्रीनेमिनाथस्वामी की कल्पलता के समान अक्षय्य सुख देनेवाली प्रतिमा विराजमान की । नारदपुरी के निकटवर्त्ती ऊँचे ऊँचे शृङ्गों (शिखरों ) से जेषैल नामक २ प्रद्युम्नसंज्ञमधुजित्तनुजेन यत्राभ्यर्णावनिधशिखरे जिननेमिचैत्यम् । निर्मापितं पथि दृशोस्तदुपैतिरम्य मद्यापि च स्फुरति तन्महिमा महीयान् ॥ २७ ॥ नव्याञ्जनद्युतिपदं प्रतिमां च तत्र, चैत्ये न्यधाद् भगवतः स हृदीव तं स्वे । साद्यापि दैवतलतेव हितार्थहेतु:, साक्षाच्छिवासुत इवैत्यतुलं प्रभावम् ॥ २८ ॥ ३ उत्तुङ्गशृङ्गसुभगः पुरि यत्र धत्ते, शोभां समीपभुवि जेषलसंज्ञशैलः । मूर्द्धाप्ररुद्धविबुधाध्वनि यत्रयाभ्यो दग्वर्त्मनाऽटति रखी रथभङ्गमीरुः ॥२९॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034961
Book TitleMeri Golwad Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherDevchandji Pukhrajji Sanghvi
Publication Year1944
Total Pages110
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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